शराबबंदी के 10 साल: नशा मुक्ति का सपना या नशे के बाजार का विस्तार?

संतोष राज पाण्डेय,पटना

2016 में जब बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुई थी, तो इसके पीछे एक बड़ा सामाजिक संकल्प था। महिलाओं की मांग, घरेलू हिंसा पर रोक, और एक नशा मुक्त समाज का वादा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस फैसले को उस वक्त ऐतिहासिक और साहसिक बताया गया। लेकिन 10 साल बाद जब हम आंकड़ों की कसौटी पर इस फैसले को तौलते हैं, तो एक असहज करने वाला सवाल सामने खड़ा होता है – क्या हमने शराब की बोतल तो बंद कर दी, लेकिन उसके बदले नशे की सिरिंज और टेबलेट के लिए दरवाजे खोल दिए?

यह संपादकीय किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि बिहार के भविष्य, यानी उसके युवाओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर है।

आंकड़े जो डराते हैं*

बिहार पुलिस के आंकड़े खुद कहानी कह रहे हैं। 2019 में जहाँ पूरे साल में NDPS एक्ट के तहत 697 मामले दर्ज हुए थे, वहीं 2026 के सिर्फ 5 महीनों में 1,905 मामले दर्ज हो चुके हैं। यह 270% से भी ज्यादा की वृद्धि है। इसका सीधा अर्थ है कि राज्य में नशीले पदार्थों का कारोबार अब छिटपुट नहीं, बल्कि एक संगठित उद्योग बन चुका है।

पिछले 10 साल में 3.16 करोड़ लीटर शराब जब्त होना और 7.15 लाख गिरफ्तारियां। औसतन हर दिन 8,650 लीटर शराब और 196 गिरफ्तारियां। ये आंकड़े दो बातें साबित करते हैं। पहला, प्रतिबंध के बावजूद शराब की मांग और सप्लाई खत्म नहीं हुई। दूसरा, पुलिस और आबकारी विभाग का पूरा तंत्र इसी में उलझ कर रह गया, जबकि दूसरी तरफ एक खतरनाक समानांतर नशे का बाजार पनपता रहा।

सबसे चिंताजनक तस्वीर जब्ती के पैटर्न में बदलाव से आती है।

2022 में जहाँ 3,677 नशीले इंजेक्शन जब्त हुए थे, 2026 के 5 महीनों में यह संख्या 3,83,066 हो गई है – यानी 100 गुना से अधिक की वृद्धि। 2022 में 29 हजार नशीली गोलियां, 2026 में 9.29 लाख गोलियां। यह कोई सामान्य वृद्धि नहीं, यह एक विस्फोट है।

और सबसे दुखद आंकड़ा किशोरों को लेकर है। 2016 से 2023 तक 7 साल में कुल 11 किशोर पकड़े गए, जबकि अकेले 2024 में 50 किशोर। यानी नशे का जाल अब स्कूल के गेट तक पहुंच गया है।

बाजार का अर्थशास्त्र: बोतल से पुड़िया तक

किसी भी नशे के बाजार को समझने के लिए उसके अर्थशास्त्र को समझना जरूरी है।

आज बिहार के ब्लैक मार्केट में शराब की एक बोतल 1,500 रुपये तक में मिलती है। महंगी है, ढूंढना मुश्किल है, पकड़े जाने का डर है। वहीं इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्राउन शुगर या स्मैक की एक छोटी खुराक 300 से 500 रुपये में मिल जाती है। जेब में आसानी से छिप जाती है, बदबू नहीं आती, और नशा शराब से तेज।

नशे के आदी व्यक्ति के लिए यह एक आसान गणित है। उसे सस्ता विकल्प मिल रहा है।

दूसरा बड़ा मोड़ कोविड लॉकडाउन के दौरान आया। जब लाखों प्रवासी मजदूर पंजाब, दिल्ली, मुंबई से लौटे, तो वे अपने साथ सिर्फ बेरोजगारी नहीं, बल्कि उन राज्यों के नशे के नेटवर्क की जानकारी और लत भी ले आए। यही वह समय था जब सिंथेटिक ड्रग्स गांव-गांव तक पहुंच गया। अब यह सिर्फ पटना, मुजफ्फरपुर जैसे शहरों की समस्या नहीं, बल्कि सहरसा, अररिया, किशनगंज के खेतों में काम करने वाले युवाओं की भी समस्या है।

‘कोटा’ – पूर्वोत्तर से आ रहा नया जहर*

रिपोर्ट में जिस ‘कोटा’ का जिक्र है, वह बिहार के ड्रग बाजार में एक नया और बेहद खतरनाक ट्रेंड है। म्यांमार, जो दुनिया के सबसे बड़े अफीम उत्पादक क्षेत्रों में से एक है, वहां से कच्ची हेरोइन सिलचर (असम) और भारत-नेपाल सीमा के रास्ते बिहार आ रही है।

इसे साबुन के डिब्बे में पैक किया जाता है। तस्करी के लिए महिलाओं और पूरे परिवार को कूरियर बनाया जा रहा है। पेटीकोट में जेब बनाकर, ट्रेन के जनरल डिब्बे में बैठकर यह जहर पटना, गया, भागलपुर पहुंच रहा है। यह तस्करी का तरीका बताता है कि यह नेटवर्क कितना संगठित और शातिर हो चुका है। यह अब छोटे-मोटे तस्करों का काम नहीं रहा।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर दोहरी मार

पटना के IGIMS के मनोचिकित्सकों की चिंता सबसे महत्वपूर्ण है। पहले नशा मुक्ति केंद्र में आने वाला मरीज 10-15 साल से गांजा या अफीम ले रहा होता था। अब 18-20 साल का लड़का 6 महीने में ही नशीले इंजेक्शन का आदी होकर साइकोसिस में पहुंच रहा है।

सिंथेटिक ड्रग्स का असर देसी शराब या गांजे से कई गुना ज्यादा घातक है। हेपेटाइटिस, HIV, नसों का सिकुड़ना, किडनी फेल होना – ये सब इंजेक्शन वाले नशे की सीधी देन हैं।

और दुखद यह है कि बिहार के एक तिहाई से भी कम जिलों में सरकारी नशा मुक्ति केंद्र हैं। सामाजिक न्याय मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि सरकारी केंद्रों में मरीजों की संख्या 2022-23 में 1,487 थी, जो 2024-25 में 29,429 हो गई – 20 गुना बढ़ोतरी। यानी मरीज 20 गुना बढ़े, लेकिन अस्पताल और डॉक्टर वही।

सरकार की कोशिश और आगे की राह

यह मानना होगा कि सरकार ने खतरे को समझा है। ‘प्रोहिबिशन एंड स्टेट नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो’ का गठन और STF की नारकोटिक्स सेल द्वारा 52 करोड़ की जब्ती सराहनीय कदम हैं।

लेकिन बिहार को पंजाब की गलती से सीखना होगा। पंजाब में हमने देखा कि सिर्फ पुलिस से ड्रग्स की समस्या खत्म नहीं होती।

हमें तीन स्तर पर काम करना होगा:

1. प्रवर्तन में बदलाव: शराब के पीछे लगी 80% पुलिस को अब NDPS नेटवर्क पर लगाना होगा। सीमा पर डॉग स्क्वायड और महिला पुलिस की तैनाती जरूरी है।

2. स्वास्थ्य में निवेश: हर जिले में एक आधुनिक नशा मुक्ति केंद्र, जहां मनोचिकित्सक, काउंसलर और दवाएं हों। स्कूलों में नशे के खिलाफ जागरूकता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा।

3. सामुदायिक भागीदारी: नशा मुक्त भारत अभियान को सिर्फ पोस्टर-बैनर से निकालकर जीविका दीदियों, पंचायत प्रतिनिधियों और छात्र संगठनों तक ले जाना होगा। जब तक मां-बाप खुद अपने बच्चे की जेब में इंजेक्शन नहीं पहचानेंगे, तब तक पुलिस कुछ नहीं कर सकती।

निष्कर्ष

शराबबंदी का इरादा नेक था, लेकिन 10 साल बाद उसकी समीक्षा जरूरी है। क्या हम सिर्फ शराब की बोतल गिनते रह जाएंगे, या यह भी देखेंगे कि उस बोतल की जगह कितनी सिरिंज ने ले ली है?

बिहार को तय करना होगा कि उसे राजस्व के नुकसान और पुलिसिया कवायद का हिसाब चाहिए, या अपने 58% युवा आबादी का भविष्य बचाना है। नशा किसी पार्टी, जाति या धर्म को नहीं देखता। यह सीधे बिहार के भविष्य पर हमला है।

अब वक्त है कि इस मुद्दे पर राजनीति से ऊपर उठकर, एक सामाजिक आंदोलन के तौर पर लड़ाई लड़ी जाए। नहीं तो विकसित बिहार का सपना, इन नशीले इंजेक्शनों की स्याही में ही डूब जाएगा।

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