BPSC आंदोलन से नीतीश की जगहंसाई हुई, अब नतीजे के बाद खुल गई शिक्षा की पोल

ओमप्रकाश अश्क

योग्य शिक्षक बिहार में मिलते नहीं. इसके लिए डोमिसाइल नीति की बंदिशें सरकार को शिथिल करनी पड़ीं. अच्छे कालेज नहीं हैं. जो हैं, वहां सिर्फ डिग्री मिलती है. प्रतियोगिता परीक्षा लेने वाले बिहार लोक सेवा आय…और पढ़ें

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प्रतियोगिता परीक्षा लेने वाले बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) जैसे संस्थान पर ही सवाल उठने लगते हैं.

बिहार बुद्धि और ज्ञान के मामले में अग्रणी अतीत वाला राज्य माना जाता है. अतीत में नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविख्यात शैक्षिक संस्थान बिहार में बने-चले हैं. बिहार की राजनीतिक परिपक्वता का पूरा देश लोहा मानता है. देश को अब सर्वाधिक आईएएस-आईपीएस देने वाले सूबों में बिहार अग्रणी कड़ी में शुमार है. ऐसे में बिहार में प्रशासनिक-पुलिस पदाधिकारी बनने वाले अभ्यर्थी सामान्य ज्ञान भी न रखते हों तो आश्चर्य होता है. इससे कई कमियां अचानक एक साथ उजागर होने लगती हैं. बिहार में अच्छे शिक्षक नहीं हैं. इसलिए कि योग्य शिक्षक बिहार में मिलते ही नहीं. इसके लिए डोमिसाइल नीति की बंदिशें सरकार ने शिथिल कर दीं. इससे दूसरे राज्यों से आए युवकों को मौका मिल जाता है. अच्छे कालेज नहीं हैं. जो हैं, वहां सिर्फ डिग्री मिलती है. कहीं-कहीं तो डिग्री बिकने की खबरें भी आती हैं. और नहीं तो प्रतियोगिता परीक्षा लेने वाले बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) जैसे संस्थान पर ही सवाल उठने लगते हैं. प्रशासनिक सेवा में जाने की चाहत रखने वाले ज्यादातर अभ्यर्थियों की योग्यता का आलम यह कि उन्हें इंटरनेशनल शूटर श्रेयसी सिंह, विष्णुपद मंदिर और पटना साहिब के बारे में भी कोई जानकारी नहीं है.

योग्य शिक्षक न मिलने के भय से डोमिसाइल हटी

बिहार में वर्ष 2022 के बाद से शिक्षकों की नियुक्ति बड़े पैमाने पर होती रही है. इसका राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश आरजेडी नेता तेजस्वी यादव भी करते हैं. इसलिए कि 2022 से दिसंबर 2024 तक के 17 महीनों में वे नीतीश कुमार की सरकार में डेप्युटी सीएम थे. 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने 10 लाख लोगों को सरकारी नौकरी देने का वादा किया था. तब नीतीश ने पैसे की कमी बता कर उनके वादे की खिल्ली उड़ाई थी. तेजस्वी का दावा है कि उनके दबाव और प्रभाव की वजह से सरकार ने नियुक्तियों का सिलसिला शुरू किया. अब तक तकरीबन 3 लाख शिक्षकों की नियुक्ति नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार ने की है. इनमें सर्वाधिक शिक्षकों की नियुक्ति तेजस्वी यादव के सरकार में रहने के दौरान हुई. नियुक्ति के पहले ही सरकार को इसका एहसास था कि बिहार में योग्य शिक्षक नहीं मिलेंगे. इसलिए सरकार ने शिक्षकों की नियुक्ति में डोमिसाइल नीति को शिथिल कर दिया. नतीजतन बड़े पैमाने पर दूसरे राज्यों के लोग शिक्षक नियुक्त हो गए. बिहार के लोगों को रोजगार की जो उम्मीद थी, उस पर पानी फिर गया. अब भी शिक्षकों की जो नियुक्तियां हो रही हैं, उनमें दूसरे राज्यों के अभ्यर्थी ही भरे हुए हैं.

अफसर बनने आए लोग बुनियादी बातें नहीं जानते

बिहार लोक सेवा आयोग ने 70वीं परीक्षा के लिए आवदेन मांगे तो 3.50 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने आवेदन दिए. परीक्षा हुई तो पेपर लीक पर विवाद शुरू हो गया. आयोग ने दो दर्जन से अधिक केंद्रों पर दोबारा परीक्षा ली. अभ्यर्थी पूरी परीक्षा रद्द कर दोबारा परीक्षा लेने की मांग कर रहे थे. इसे लेकर अभ्यर्थियों ने धरना-प्रदर्शन शुरू किया. उनके आक्रोश को भुनाने की राजनीतिक कोशिशें भी शुरू हो गईं. उनकी शुभचिंता में सबसे पहले तेजस्वी यादव आधी रात समर्थन देने पहुंचे. बाद में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की एंट्री हुई. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी पटना पहुंचने पर धरना दे रहे अभ्यर्थियों से मुलाकात की. एलजेपीआर के नेता चिराग पासवान भी अभ्यर्थियों के पक्ष में बोलने लगे. प्रशांत किशोर की पार्टी ने तो इस मामले को लेकर पटना हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया है. उससे पहले करीब पखवाड़े भर प्रशांत ने अनशन भी कया.

बहरहाल, इस प्रकरण में एक सबसे महत्वपूर्ण और बिहार के लिए बेहद शर्मनाक तथ्य भी उजागर हुआ. परीक्षा परिणाम घोषित होने पर इन तथ्यों के बारे में जानकारी मिली. परीक्षा लेने वाले BPSC के परीक्षा नियंत्रक राजेश कुमार के मुताबिक ऐसा कहने वाले काफी लोग थे कि परीक्षा में आसान सवाल पूछे गए थे. इसके बावजूद 1.70 लाख अभ्यर्थी सवालों का सही जवाब नहीं लिख पाए. महिला विधायक और इंटरनेशनल अवार्ड जीतने वाली शूटर श्रेयसी सिंह से संबद्ध सवाल का सही जवाब अभ्यर्थी नहीं दे पाए. गया के विष्णु पद मंदिर से जुड़े सवाल का सही जवाब डेढ़ लाख से अधिक अभ्यर्थी नहीं लिख पाए. पटना साहिब के बारे में भी 50503 अभ्यर्थियों के जवाब गलत थे.

फोर्थ ग्रेड की नौकरियों के लिए डिग्री धारी आवेदक

बिहार में शिक्षा का स्तर और बेरोजगारी की समस्या को इससे भी समझा जा सकता है कि वर्ष 2020 में बिहार विधानसभा में चपरासी, माली, सफाईकर्मी और दरबान के 136 पदों पर भर्ती के लिए पांच लाख से अधिक आवेदन आए थे. आवेदकों में सैकड़ों उम्मीदवार बीटेक और एमटेक की डिग्री वाले थे. ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री धारी आवेदकों की तादाद भी हजारों में थी. आवेदकों की खासा संख्या ऐसी भी थी, जिन्होंने आईएएस-आईपीएस की प्रारंभिक परीक्षा पास कर ली थी. मैट्रिक या इसके समकक्ष परीक्षा फोर्थ ग्रेड की इन नौकरियों की शैक्षिक योग्यता निर्धारित थी.

बिहार में ही उजागर हुआ बहुचर्चित टॉपर घोटाला

बिहार में मैट्रिक से लेकर कालेज तक की परीक्षाएं कैसे होती रही हैं, इसका एक नमूना 2016 में सामने आया था. इंटरमीडिएट परीक्षा के स्टेट टापर की जो सूची बनी, उनमें आर्ट्स में रूबी राय, साइंस में सौरभ श्रेष्ठ और साइंस के ही तीसरे टापर राहुल कुमार को गलत तरीके से टापर घोषित किया गया था. इसका रहस्योद्घाटन तब हुआ, जब टीवी चैनलों पर इनके इंटर्वयू आए. इंटरव्यू में सामान्य सवालों का भी वे जवाब नहीं पाए. घोटाले की पोल खुलने के बाद टापर की सूची रद कर दी गई. इस घोटाले के मास्टरमाइंड बच्चा राय निकले. वे विष्णु राय कालेज के प्रिंसिपल थे. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. धोखाधड़ी मामले में बच्चा राय की बेटी शालिनी राय को भी आरोपी बनाया गया. बच्चा राय 2015 में आरजेडी के टिकट पर विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं. बताया जाता है कि रुबी राय के पिता से उनकी बेटी को टापर बनाने के लिए बच्चा राय ने 6 एकड़ जमीन देने का वचन लिया था.

शिक्षा पर सरकार का सर्वाधिक खर्च, पर हाल बुरा

आश्चर्य की बात है कि नीतीश कुमार ने शिक्षा की स्थिति सुधारने के लिए पहले अच्छे भवनों का निर्माण कराया. फिर बड़े पैमाने पर नियोजित शिक्षकों की नियुक्ति की गई. उन्हें सरकारी शिक्षक का दर्जा सरकार ने दिया. बड़े पैमाने पर शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया दो वर्षों से चल रही है. राज्य सरकार ने पिछले बजट में शिक्षा के लिए 52639.03 करोड़ रुपए का बजट प्रावधान किया था. इस बार यह राशि बढ़ने की पूरी संभावना है. पर, ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता गया. शिक्षा का स्तर बीपीएससी की 70वीं परीक्षा से उजागर हो गया है.

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