अनूप कुमार सिंह
पटना
सोशल मीडिया, जो कभी संवाद और रचनात्मकता का मंच माना जाता था, आज धीरे–धीरे कई परिवारों के लिए परेशानी का सबक बनता जा रहा है। बीते एक महीने में सिर्फ पटना शहर और आसपास के इलाकों से आधा दर्जन से अधिक ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जहां 15 साल का नाबालिग लड़का, 40 साल की शादीशुदा महिला या 20 साल का बेरोजगार युवक—सोशल मीडिया के जरिए बने रिश्तों के चलते घर-परिवार छोड़कर फरार हो गए। इन घटनाओं ने न केवल समाज को चौंकाया है, बल्कि डिजिटल दुनिया के बढ़ते प्रभाव और उसके दुष्परिणामों पर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं।पुलिस और सामाजिक संगठनों के मुताबिक, इन मामलों में एक समान पैटर्न दिख रहा है—पहले फेसबुक, इंस्टाग्राम या यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर पहचान, फिर चैटिंग, वीडियो कॉल और उसके बाद भावनात्मक जुड़ाव। कई मामलों में यह जुड़ाव इतना गहरा हो गया कि लोगों ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों, परिवार और बच्चों तक को नजरअंदाज कर दिया।हाल ही में सामने आए एक मामले में 40 साल की शादीशुदा महिला एक 20 साल के बेरोजगार क्रिएटर के साथ फरार हो गई। वहीं, एक अन्य घटना में 15 साल का नाबालिग लड़का सोशल मीडिया पर बनी दोस्ती के बाद घर छोड़कर चला गया। ऐसे मामलों में परिवार न सिर्फ सामाजिक बदनामी झेल रहे हैं, बल्कि मानसिक और आर्थिक संकट से भी गुजर रहे हैं।सोशल मीडिया पर खुद को ‘क्रिएटर’ कहने की होड़ लगी है। हर कोई वायरल होने की चाह में अपनी निजी जिंदगी को भी कंटेंट बना रहा है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि लाइक, व्यू और फॉलोअर की संख्या लोगों को एक नकली आत्म-संतुष्टि देती है। यही संतुष्टि धीरे–धीरे वास्तविक रिश्तों से दूरी और वर्चुअल दुनिया पर निर्भरता बढ़ाती है।एक वरिष्ठ मनोचिकित्सक बताते हैं, “सोशल मीडिया पर बना रिश्ता अक्सर कल्पनाओं पर टिका होता है। जब लोग उस भ्रम में जीने लगते हैं, तो उन्हें असली दुनिया की जिम्मेदारियां बोझ लगने लगती हैं।”इन मामलों में पुलिस के सामने भी बड़ी चुनौती है। कई बार नाबालिगों के शामिल होने से मामला गंभीर कानूनी रूप ले लेता है। साइबर सेल के अधिकारी मानते हैं कि तकनीक का गलत इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, जबकि डिजिटल साक्षरता और पारिवारिक निगरानी उतनी मजबूत नहीं हो पाई है।सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सिर्फ कानून से इस समस्या का हल नहीं निकलेगा। परिवारों को भी अपने बच्चों और युवाओं से संवाद बढ़ाना होगा। मोबाइल और सोशल मीडिया की अंधी आज़ादी के बजाय समझदारी भरी निगरानी जरूरी है।पटना और बिहार के अन्य जिलों में लगातार सामने आ रही ये घटनाएं समाज के लिए चेतावनी हैं। सोशल मीडिया बुरा नहीं है, लेकिन उसका बेलगाम इस्तेमाल रिश्तों, संस्कारों और सामाजिक ढांचे को कमजोर कर रहा है। जरूरत इस बात की है कि हम तकनीक को अपने नियंत्रण में रखें, न कि खुद उसके गुलाम बन जाएं।
अगर समय रहते समाज, परिवार और प्रशासन ने मिलकर इस बढ़ते खतरे पर ध्यान नहीं दिया, तो ‘वायरल’ होने की यह दौड़ और भी कई घरों को उजाड़ सकती है।








