नेपाली कांग्रेस की फूट: विदेशी खेल या घरेलू सत्ता का संघर्ष?✒️ डॉ. निरंजन


✒️ डॉ. निरंजन


नेपाल की राजनीति में जब भी कोई बड़ा भूचाल आता है, एक सवाल अपने-आप हवा में तैरने लगता है—“इसके पीछे विदेशी हाथ तो नहीं?”
आज नेपाली कांग्रेस में जो टूट-फूट, गुटबाजी और नेतृत्व-संघर्ष खुलकर सामने आया है, वही सवाल फिर से चर्चा में है। क्या यह केवल घर के भीतर की आग है, या फिर किसी बाहरी शक्ति की हवा भी इसे भड़का रही है?
इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें नेपाली कांग्रेस को केवल “आज की पार्टी” के रूप में नहीं, बल्कि इतिहास की उस धारा के रूप में देखना होगा, जो बलिदान, लोकतंत्र और त्याग से बनी थी—और जिस पर नेपाल की आधुनिक पहचान खड़ी है।
नेपाली कांग्रेस: एक पार्टी नहीं, एक आंदोलन
नेपाली कांग्रेस का जन्म सत्ता पाने की लालसा से नहीं हुआ था। इसका जन्म हुआ था राणा शासन की निरंकुशता, अभिव्यक्ति पर पहरे, और जनता की आत्मा पर पहरे के विरुद्ध। यह वह दौर था जब राजनीति करना नहीं, राजनीति का सपना देखना भी अपराध माना जाता था।
नेपाली कांग्रेस उन्हीं दिनों एक उम्मीद बनकर उभरी—एक ऐसी उम्मीद जो कहती थी:
“नेपाल जनता का देश होगा, किसी परिवार का नहीं।”
BP कोइराला का सपना: लोकतंत्र, मानवता और आधुनिक नेपाल
यदि नेपाली कांग्रेस की आत्मा का कोई नाम है, तो वह है बीपी कोइराला।
BP ने नेपाल के राणा से मुक्ति के लिए युद्ध किया राणा के निरंकुश शाशन को उखाड़ फेंका आज भी लोगों के जेहन में 1950 -52 याद होगा Biratnagar कैसे युद्ध का मैदान बन गया था। BP ने जिस नेपाली कॉंग्रेस पार्टी की स्थापना किया और जो सपना उन्होंने देखा आज वो टूटता हुआ प्रतीत हो रहा है।BP एक सम्पूर्ण क्रांति थे उनका जीवन देश के चिंतन में ही बीत गया।
बीपी सिर्फ राजनेता नहीं थे—वे नेपाल में लोकतांत्रिक चेतना के दार्शनिक और स्थापक थे।
उनका सपना साफ था:
सत्ता नहीं, संविधान सर्वोच्च होगा
जनता नहीं, नागरिक होगा
शासन नहीं, लोकतंत्र होगा
डर नहीं, अधिकार होगा
बीपी ने जिस कांग्रेस की कल्पना की थी, वह ऐसी पार्टी थी जिसमें विचार आगे चलता, व्यक्ति पीछे।
लेकिन आज वही पार्टी—विचार की जगह व्यक्ति-प्रधान गुटों में बंटती दिख रही है।
गिरिजा प्रसाद कोइराला का त्याग: लोकतंत्र को जीवित रखने की कीमत
नेपाल के लोकतांत्रिक संघर्ष का दूसरा बड़ा स्तंभ रहे गिरिजा प्रसाद कोइराला।
उनका जीवन राजनीति की सुविधा नहीं, राजनीति की तपस्या था।
नेपाल में लोकतंत्र जब-जब कमजोर पड़ा, गिरिजा जी ने खुद को जनता और व्यवस्था के बीच पुल बनाकर खड़ा किया।
उनके दौर में नेपाल ने:
आंदोलन देखा
समझौते देखे
राजतंत्र की छाया देखी
दरवार हत्याकांड को देखा
और गणतंत्र की सुबह भी देखी
गिरिजा जी की राजनीति में आलोचना बहुत हुई, पर एक बात कोई नहीं नकार सकता—
उन्होंने सत्ता को कभी सिर्फ कुर्सी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी माना।
आज नेपाली कांग्रेस में जो गुटबाजी है, वह गिरिजा-युग की उस कांग्रेस से बहुत दूर दिखती है, जहाँ लड़ाई देश के लिए होती थी—पद के लिए नहीं।
एक बार देवुवा जी ने भी कॉंग्रेस से अलग होकर एक प्रयोग किया था।
गणेश मान सिंह का समर्पण: सत्ता छोड़ने की महानता
नेपाली लोकतंत्र के इतिहास में गणेश मान सिंह का नाम एक नैतिक पर्वत की तरह खड़ा है।
वे “आयरन मैन” कहे गए—लेकिन उनका असली लौह-बल उनकी दृढ़ता नहीं, उनका त्याग था।
गणेश मान सिंह वह नेता थे जिन्होंने लोकतंत्र को जीतने के बाद भी, सत्ता को पकड़कर नहीं रखा।
उन्होंने दिखाया कि राजनीति का सबसे बड़ा पद मंत्री या प्रधानमंत्री नहीं—
जनता के भरोसे का पद होता है।
आज जब नेपाली कांग्रेस के भीतर “कौन अध्यक्ष बनेगा” के नाम पर दीवारें खड़ी हो रही हैं, तब गणेश मान सिंह की राजनीति एक प्रश्न बनकर सामने आती है:
क्या कांग्रेस अब भी त्याग की पार्टी है, या सिर्फ प्रबंधन की मशीन?
हजारों कार्यकर्ताओं का बलिदान: जो इतिहास में नहीं, मिट्टी में दर्ज है
नेपाली कांग्रेस का इतिहास केवल बड़े नामों से नहीं बना।
यह इतिहास बना है हजारों गुमनाम कार्यकर्ताओं से—
जो जेल गए, यातनाएँ सहे, निर्वासन में जिए, और कई तो लौटे ही नहीं।
कांग्रेस का झंडा सिर्फ चुनावी अभियान में नहीं उठा—
वह झंडा कई बार अंधेरी कोठरियों में, शरणार्थी जीवन में, और सड़क के संघर्ष में उठा।
आज जब यही पार्टी गुटों में बँटकर अपने ही घर को कमजोर कर रही है, तब सवाल उठता है:
क्या उन बलिदानों की कीमत यही थी कि पार्टी भीतर से खोखली हो जाए?
आज की फूट: “विदेशी खेल” से ज्यादा “घरेलू कमजोरी”
अब मूल सवाल पर लौटते हैं—क्या इसमें अमेरिका लॉबी का हाथ है?
क्या इसमें भारत का कोई हाथ है क्या?
कई ऐसे सवाल जन्म लेते हैं
इसमें कोई शक नहीं कि नेपाल आज भू-राजनीति का केंद्र बन चुका है।
यहाँ हर शक्ति की रुचि है—कभी विकास के नाम पर, कभी रणनीति के नाम पर, कभी सुरक्षा के नाम पर।
ऐसे में बाहरी प्रभाव की संभावना को पूरी तरह नकारना भी भोलेपन जैसा होगा।
लेकिन सच यह भी है कि किसी देश की राजनीति को विदेशी ताकतें तब ही तोड़ पाती हैं, जब भीतर से दरारें पहले से मौजूद हों।
नेपाली कांग्रेस की आज की स्थिति देखकर ऐसा लगता है कि यह संकट मुख्यतः:
नेतृत्व के अहंकार
संगठनात्मक अनुशासन की कमी
टिकट और पद की राजनीति
और “मैं ही पार्टी हूँ” वाली मानसिकता
का परिणाम है।
अहंकार भी एक कारण है, सत्ता की लोलुपता आदमी को धृतराष्ट्र बना देता है।
राजनीति में त्याग का बहुत बड़ा महत्व है।
आज शेर जी इस प्रस्थिति को समझने और सम्हाले में असफल दिखाई दे रहे हैं।
लोकतंत्र में व्यक्ती बड़ा नहीं होता।
विदेशी हाथ हो या न हो—लेकिन आज की आग का ईंधन घरेलू है।
यह केवल कांग्रेस का संकट नहीं—नेपाल के लोकतंत्र का संकट है
नेपाली कांग्रेस नेपाल की लोकतांत्रिक धुरी रही है।
जब यह पार्टी मजबूत रही, नेपाल में लोकतंत्र की उम्मीद मजबूत रही।
और जब यह पार्टी कमजोर हुई—तब सत्ता का खेल ज्यादा खतरनाक हुआ।
क्योंकि नेपाल जैसे देश में, जहाँ संस्थाएँ अभी भी परिपक्वता की यात्रा में हैं—
लोकतांत्रिक दलों की कमजोरी सीधे राज्य की कमजोरी बन जाती है।
आज कांग्रेस की यह फूट केवल “दो गुट” की खबर नहीं है।
यह नेपाल के युवाओं के भरोसे की परीक्षा है।
यह लोकतंत्र की विश्वसनीयता की परीक्षा है।
और यह उस इतिहास की भी परीक्षा है, जिसे बीपी ने सपना देखा था, गिरिजा ने निभाया था और गणेश मान सिंह ने नैतिकता से सींचा था।
अंतिम प्रश्न: कांग्रेस किस रास्ते पर जाएगी?
आज नेपाली कांग्रेस के सामने दो रास्ते हैं:
पहला रास्ता: गुटों का युद्ध
जिसमें पार्टी अपने ही हाथों से अपना चिन्ह नहीं, अपनी आत्मा खो दे।
इतना तो तय है चुनाव चिन्ह किसी को भी मिले लेकिन इसका संदेश अच्छा नहीं जायगा। आने वाला समय कटों से भरा होगा फूलों से नहीं।
दूसरा रास्ता: इतिहास की ओर वापसी
जहाँ कांग्रेस फिर से याद करे कि:
यह पार्टी पदों के लिए नहीं बनी थी,
यह पार्टी लोकतंत्र की रक्षा के लिए बनी थी।
अगर कांग्रेस को सचमुच जीवित रहना है, तो उसे फिर से अपनी पहचान बनानी होगी—
विचार से, संगठन से, जनता से।
क्योंकि नेपाली कांग्रेस का जन्म “चुनाव” से नहीं हुआ था,
उसका जन्म “संघर्ष” से हुआ था।
और जो पार्टी संघर्ष से बनी हो—
उसे टूटने का अधिकार नहीं,
सुधरने की जिम्मेदारी होती है।

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