संतोष राज पाण्डेय
बहुत समय पहले की बात है, एक गरीब ब्राह्मण वृंदावन आया। वह बांके बिहारी की छवि देखकर इतना मंत्रमुग्ध हो गया कि उसने कई दिनों तक मंदिर में ही डेरा डाल लिया। वह घंटों बस निहारता रहता और मन ही मन उनसे बातें करता।
जब ब्राह्मण के वापस जाने का समय आया, तो उसकी आँखों में आँसू थे। वह मंदिर के सामने खड़ा होकर रोने लगा और बोला— “प्रभु, मैं तो जा रहा हूँ, पर आपके बिना मेरा मन वहाँ कैसे लगेगा? क्या आप मेरे साथ नहीं चलेंगे?”
बिहारी जी तो ठहरे करुणा के सागर। भक्त की पुकार सुनकर वे अपनी मर्यादा छोड़कर उस ब्राह्मण के पीछे-पीछे चल दिए।
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अगले दिन जब मंदिर के पुजारी ने पट खोले, तो वह दंग रह गया। सिंहासन खाली था! ठाकुर जी गायब थे। पूरे वृंदावन में हड़कंप मच गया। पुजारी रोने लगा और प्रार्थना करने लगा कि “हे प्रभु! हमसे क्या अपराध हुआ जो आप चले गए?”
तभी भगवान ने पुजारी को स्वप्न दिया या अंतर्मन में संकेत दिया कि— “मेरा एक भक्त मुझे पुकार कर ले गया है, मैं उसके पीछे-पीछे जा रहा हूँ।”
पुजारी और मंदिर के लोग भागते हुए वृंदावन की सीमा तक पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि वह ब्राह्मण आगे-आगे चल रहा है और साक्षात् बिहारी जी बालक के रूप में उसके पीछे-पीछे चुपचाप चले जा रहे हैं।
पुजारियों ने उस ब्राह्मण को रोका और सारा वृत्तांत सुनाया। ब्राह्मण को भी एहसास हुआ कि उसके प्रेम ने ठाकुर जी को असुविधा में डाल दिया है। बड़े अनुनय-विनय के बाद बिहारी जी को वापस मंदिर लाया गया।
यही कारण है कि बांके बिहारी मंदिर में अन्य मंदिरों की तरह आरती या दर्शन के समय लगातार पट खुले नहीं रहते। हर दो मिनट में पर्दा (झाँकी) लगाया जाता है। मान्यता है कि यदि कोई भक्त बिहारी जी की आँखों में आँखें डालकर देर तक प्रेम से निहारे, तो बिहारी जी आज भी उसके साथ मंदिर छोड़कर चल देते हैं।
बिहारी जी केवल मूर्ति नहीं, बल्कि एक जीवंत सत्ता हैं जो केवल भाव के भूखे हैं। भक्त और भगवान के बीच कोई पर्दा नहीं होता, लेकिन उनकी सुरक्षा के लिए पुजारियों को पर्दा लगाना पड़ता है।








