आध्यात्मिक गुरु पं कमला पति त्रिपाठी प्रमोद
🪷⭐🪷वसंत पंचमी सनातन धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। देवी सरस्वती की उपासना की जाती है। इस शुभ दिन पर मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। इसलिए यह पर्व विद्या और सृजन का प्रतीक माना जाता है।

शास्त्रों में भी वसंत पंचमी के महत्व का उल्लेख मिलता है। यदि इस शुभ मौके पर केवल मां सरस्वती के नामों का स्मरण किया जाए, तो वह शीघ्र ही प्रसन्न होकर अपनी कृपा बरसाती हैं। यही नहीं साधक के भाग्य में वृद्धि, समय में बदलाव, कला में निखार और सद्बुद्धि की प्राप्ति होती हैं। यह पर्व माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर मनाया जाता है। इस बार वागीश्वरी जंयती,वसंतोत्सव, वसंत पंचमी, विद्यादायिनी सरस्वती पूजा इस वर्ष 23 जनवरी 2026 शुक्रवार को अपराह्न मनाया जाएगा।
ज्ञान, कला, बुद्धि और संगीत की देवी माँ सरस्वती के जन्म से जुड़ा है, जो वसंत पंचमी के दिन मनाया जाता है; ब्रह्माजी द्वारा सृष्टि के सृजन के बाद नीरसता को दूर करने के लिए उनकी रचना और श्रीकृष्ण के वरदान के कारण इस दिन उनकी पूजा से विद्या और रचनात्मकता का आशीर्वाद मिलता है, जिससे जीवन में सकारात्मकता व उन्नति के मार्ग खुलते हैं।
ब्रह्माजी द्वारा रचना पौराणिक कथा के अनुसार, सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी ने जब संसार को नीरस और मूक पाया, तो उन्होंने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे हरियाली फैली और देवी सरस्वती प्रकट हुईं। ब्रह्माजी ने उन्हें वीणा और पुस्तक से सृष्टि को आलोकित करने का आदेश दिया।
श्रीकृष्ण का वरदान ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने देवी सरस्वती को वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन उनकी पूजा की जाएगी। इसी वरदान के फलस्वरूप इस दिन सरस्वती पूजा की परंपरा शुरू हुई।
ज्ञान और बुद्धि की देवी सरस्वती को ज्ञान, विवेक, बुद्धि, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है, जिनकी पूजा से व्यक्ति को विद्या और रचनात्मकता मिलती है।
यह पूजा वसंत ऋतु के आगमन के साथ मनाई जाती है, जो नई शुरुआत और ज्ञान की खोज का प्रतीक है।
देवी सरस्वती को हंस (पवित्रता), कमल (ज्ञान), वीणा (संगीत) और पुस्तकों (विद्या) के साथ दर्शाया जाता है।
इस दिन पूजा-अर्चना से बौद्धिक क्षमता बढ़ती है और चित्त की चंचलता दूर होती है।
अक्षराभ्यास: छोटे बच्चों को अक्षर ज्ञान कराने के लिए ‘अक्षराभ्यास’ का अनुष्ठान भी इसी दिन किया जाता है।
पीला रंग ज्ञान और पवित्रता के प्रतीक के रूप में पीले रंग का प्रयोग प्रमुखता से किया जाता है, और इसी रंग के वस्त्र और सजावट इस दिन देखे जाते हैं।
माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को सुबह स्नान के बाद देवी सरस्वती की मूर्ति या चित्र स्थापित किया जाता है।
उन्हें पीले फूल, चंदन और यज्ञोपवीत अर्पित किया जाता है।
पुस्तकें, कलम और वाद्य यंत्रों (जैसे वीणा) को देवी के चरणों में रखकर उनकी पूजा की जाती है। भगवती सरस्वती के शाश्वत जाप से संपूर्ण विद्या की प्राप्ति होती है।
मंत्रोच्चार और भजन-कीर्तन के साथ पूजा की जाती है, जिससे ज्ञान और सकारात्मकता का संचार होता है।
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