डॉ निरंजन
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नेपाल आज एक भयावह प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा है। उफनती नदियां अपने साथ घर, खेत, सड़कें, पुल और वर्षों की कमाई बहा ले गईं। किसी मां ने अपना बच्चा खोया, किसी बच्चे के सिर से माता-पिता का साया उठ गया, किसी का पूरा परिवार उजड़ गया। कितने लोग आज भी अपनों की तलाश में नदी के किनारे आंखें लगाए बैठे हैं।

ऐसी विपत्ति में मनुष्य से सबसे अधिक जिस चीज़ की अपेक्षा होती है, वह है—मनुष्यता।
लेकिन इसी त्रासदी के बीच सामने आई कुछ घटनाओं ने एक और सवाल खड़ा कर दिया है—क्या बाढ़ केवल हमारी संपत्ति बहाकर ले गई है, या हमारे भीतर बची संवेदना भी?
खबरों के अनुसार, भोटेकोशी क्षेत्र की बाढ़ में बहकर आई एक तिजोरी बाद में धाडिंग के गलछी क्षेत्र में त्रिशुली नदी के किनारे मिली। आरोप है कि उसे तोड़कर उसमें रखी नकदी निकाल ली गई। पुलिस ने इस मामले में 29 लोगों को हिरासत में लिया और करीब 92 लाख 68 हजार रुपये से अधिक नकदी बरामद की।
लेकिन इससे भी अधिक विचलित करने वाली घटना नारायणी नदी के किनारे सामने आई।
बाढ़ में बहकर आई एक मृत महिला के शरीर से कथित तौर पर सोने की बालियां निकाल ली गईं। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद दो लोगों को हिरासत में लिया गया।
यहां प्रश्न सोने की दो बालियों की कीमत का नहीं है। ऐसे में इंसान और गिद्ध में क्या अन्तर रह जाता है?
प्रश्न उस मनुष्य की कीमत का है, जिसके भीतर एक मृत देह को देखकर भी करुणा नहीं जागी।
वह महिला कौन थी?
शायद किसी की मां रही होगी।
किसी की पत्नी।
किसी की बेटी।
किसी की बहन।
कहीं कोई परिवार आज भी उसकी तस्वीर लेकर उसे तलाश रहा होगा। किसी बच्चे को शायद अब तक उम्मीद होगी कि उसकी मां लौट आएगी। और दूसरी तरफ उसी निर्जीव शरीर को किसी ने एक इंसान की अंतिम निशानी नहीं, बल्कि कानों में पड़े सोने के रूप में देखा।
इससे अधिक भयावह दृश्य शायद बाढ़ का पानी भी नहीं हो सकता।
प्रकृति जब क्रोधित होती है तो वह मकान गिराती है, सड़कें तोड़ती है, खेत बहाती है और पहाड़ों को चीर देती है। लेकिन जब मनुष्य के भीतर की संवेदना मरने लगती है, तब समाज टूटता है।
और समाज का टूटना किसी पुल के टूटने से कहीं अधिक खतरनाक है। टूटे पुल, टूटी इमारत और रास्ते बनाए जा सकते हैं लेकिन जब इंसानियत टूटती है तब??
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
क्या हमने सफलता को केवल धन से मापना शुरू कर दिया है? क्या उपभोक्तावाद, लालच और हर परिस्थिति में अपना लाभ खोजने की प्रवृत्ति इतनी गहरी हो चुकी है कि आपदा भी अब कुछ लोगों के लिए अवसर बन गई है?
हम अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी और व्यापारी बनाने के लिए लाखों खर्च करते हैं; अच्छे स्कूल और विश्वविद्यालय खोजते हैं। लेकिन शायद कहीं हम उन्हें यह सिखाना भूलते जा रहे हैं कि सबसे पहले एक अच्छा इंसान बनना जरूरी है। और हम यही नहीं बना पा रहे हैं, जीवन का मूल्य।
शिक्षा यदि मनुष्य के भीतर करुणा पैदा नहीं करती, धर्म यदि संकट में पड़े व्यक्ति का हाथ पकड़ना नहीं सिखाता और समृद्धि यदि दूसरों के दुःख को महसूस करने की क्षमता छीन लेती है, तो हमें अपने सामाजिक विकास की परिभाषा पर दोबारा विचार करना होगा।
फिर भी इन घटनाओं को देखकर पूरे नेपाल या पूरे समाज को कठघरे में खड़ा करना भी अन्याय होगा। ऐसे लोग हर समाज हर देश के लिए एक बदनुमा दाग है।
इसी आपदा में हजारों ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अनजान लोगों को बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाली। सुरक्षाकर्मी उफनती नदियों में उतरे, चिकित्साकर्मी घायलों के उपचार में लगे, स्वयंसेवकों ने भोजन और कपड़े पहुंचाए और सामान्य नागरिकों ने अपने घरों के दरवाजे बेघर लोगों के लिए खोल दिए।
यही नेपाल का वास्तविक चेहरा है।
कुछ लोगों का अपराध पूरे समाज की पहचान नहीं बन सकता। लेकिन ऐसी घटनाएं हमारे सामने एक आईना अवश्य रखती हैं।
हमें उस आईने में स्वयं से पूछना चाहिए—
हम किस तरह का समाज बना रहे हैं?
एक ऐसा समाज जहां बहती हुई तिजोरी देखकर सबसे पहले रुपये दिखाई दें और बहती हुई लाश देखकर सोना?
या ऐसा समाज जहां किसी अनजान मृत व्यक्ति की देह भी देखकर मनुष्य सिर झुकाए और कहे—
“यह मेरा अपना नहीं था, लेकिन यह भी किसी का अपना था।”
सभ्यता की असली परीक्षा बड़े-बड़े भवनों, चौड़ी सड़कों और आर्थिक आंकड़ों से नहीं होती। उसकी परीक्षा तब होती है जब चारों तरफ अराजकता हो और फिर भी मनुष्य किसी असहाय व्यक्ति के अधिकार, सम्मान और गरिमा की रक्षा करे।
मृत्यु के बाद भी किसी मनुष्य की देह सम्मान की अधिकारी है।
उसकी उंगली की अंगूठी, कान की बाली, गले की चेन या जेब में पड़े रुपये किसी लावारिस वस्तु की तरह नहीं हो जाते। वे संभवतः उस परिवार की अंतिम निशानी हैं जिसने पहले ही अपना सबसे अनमोल व्यक्ति खो दिया है।
आज नेपाल को केवल टूटे पुलों और सड़कों के पुनर्निर्माण की आवश्यकता नहीं है।
हमें मानवीय मूल्यों के पुनर्निर्माण की भी आवश्यकता है।
बाढ़ का पानी कुछ दिनों बाद उतर जाएगा।
नदियां फिर शांत हो जाएंगी।
सड़कें दोबारा बन जाएंगी।
टूटे हुए मकान भी शायद फिर खड़े हो जाएंगे।
लेकिन यदि हमारे भीतर की संवेदना बह गई, तो उसे वापस लाना बहुत कठिन होगा।
इस त्रासदी में मरने वालों के लिए हमारी सच्ची श्रद्धांजलि केवल शोक संदेश नहीं हो सकती। सच्ची श्रद्धांजलि यह होगी कि हम जीवित लोगों के भीतर इंसानियत को जीवित रखें।
क्योंकि अंततः प्रश्न यह नहीं रहेगा कि इस बाढ़ में कितने रुपये बह गए, कितने घर टूटे या कितना सोना खो गया।
इतिहास हमसे एक अधिक कठिन प्रश्न पूछेगा—
जब चारों ओर इंसान मर रहे थे, तब हमारे भीतर का इंसान कितना जीवित था?
और शायद यही इस पूरी त्रासदी का सबसे दर्दनाक प्रश्न है।






