पुष्पा कुमारी
कभी कक्षा में शिक्षक ही ज्ञान का एकमात्र स्रोत होता था। ब्लैकबोर्ड पर लिखा एक वाक्य ही सत्य माना जाता था। आज स्थिति उलट गई है। एक 10 साल के बच्चे के हाथ में स्मार्टफोन है, जिसमें गूगल, यूट्यूब, चैटजीपीटी है। वह पलक झपकते ही मंगल ग्रह की दूरी, पानीपत की लड़ाई का साल या पाइथागोरस थ्योरम निकाल लेता है।
तो सवाल स्वाभाविक है – जब जानकारी हर जगह है, तो शिक्षक आखिर क्या पढ़ाए?

इस सवाल का जवाब इस सच्चाई में छिपा है कि जानकारी होना और ज्ञान होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
1. शिक्षक अब सूचना नहीं, समझ देगा
इंटरनेट के पास सूचना है, शिक्षक के पास समझ है। गूगल बता देगा कि द्वितीय विश्व युद्ध 1939 में शुरू हुआ, लेकिन वह ये नहीं बताएगा कि युद्ध क्यों होते हैं, नफरत कैसे पनपती है और शांति कैसे बचाई जाती है।
बच्चे के पास डेटा है, शिक्षक को उसे विवेक में बदलना है। यह बताना है कि कौन सी जानकारी सही है, कौन सी अधूरी है और कौन सी झूठी है। आज के फेक न्यूज के दौर में यह सबसे बड़ी शिक्षा है।
2. सवाल पूछना सिखाना, जवाब रटाना नहीं
पहले हम बच्चों को जवाब रटाते थे। अब जरूरत है सवाल पूछना सिखाने की। एक बुद्धिमान बच्चा गूगल से जवाब निकाल लेगा, लेकिन सही सवाल क्या है, यह तो शिक्षक ही सिखाएगा।
क्यों, कैसे, क्या होगा अगर… ये सवाल इंटरनेट नहीं, जिज्ञासा पैदा करती कक्षा पैदा करती है। शिक्षक का काम अब उत्तरदाता से बदलकर एक जिज्ञासु साथी का हो गया है।
3. तकनीक से तेज नहीं, इंसानियत में गहरा बनाना
इंटरनेट बच्चे को होशियार बना सकता है, लेकिन विनम्र, धैर्यवान, सहानुभूतिपूर्ण नहीं बना सकता।
एक वीडियो ट्यूटोरियल आपको गणित सिखा देगा, पर असफल होने पर हिम्मत नहीं देगा। गूगल आपको सफल लोगों की सूची दे देगा, पर हार को कैसे संभालना है, यह कक्षा में खड़ा शिक्षक ही सिखाएगा।
आज के बच्चे को जरूरत है – एकाग्रता, भावनात्मक संतुलन, टीम में काम करना, नैतिक निर्णय लेना। ये कोई एप नहीं सिखाता।
4. तो आज के शिक्षक को क्या पढ़ाना चाहिए?
क) कैसे सीखना है, यह सिखाना: जानकारी तो बदलती रहेगी, लेकिन सीखने का तरीका हमेशा काम आएगा।
ख) चरित्र पढ़ाना: ईमानदारी, समय की कद्र, बड़ों का सम्मान – ये सिलेबस में नहीं हैं, पर जीवन में सबसे ज्यादा जरूरी हैं।
ग) जमीनी अनुभव देना: किताबी ज्ञान को खेत, बाजार, प्रयोगशाला और समाज से जोड़ना।
सच तो यह है कि आज शिक्षक की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा बड़ी हो गई है। पहले वह मल्लाह था जो नाव में बैठाकर पार लगाता था। आज वह लाइटहाउस है, जब चारों तरफ सूचनाओं का समंदर है और बच्चे भटक सकते हैं, तो वह दिशा दिखाता है।
इंटरनेट बच्चों को बता सकता है कि दुनिया में क्या है, लेकिन शिक्षक ही बताएगा कि इस दुनिया में उन्हें कैसा इंसान बनना है।
इसलिए शिक्षक अप्रासंगिक नहीं हुआ है, वह और अधिक प्रासंगिक हो गया है।







