संतोष राज पाण्डेय
बिहार और बंगाल का संबंध आज का नहीं है। यह संबंध रेल की पटरियां बिछने से पहले का है, गंगा पर स्टीमर की सीटी गूंजने से पहले का है। यह उन लाखों पगडंडियों का संबंध है, जो पेट की आग बुझाने के लिए बिहार के गांवों से बंगाल की ओर जाती थीं।
आज के राजनीतिक भूगोल में बंगाल और बिहार दो अलग प्रदेश हैं, पर इतिहास के पन्नों में दोनों एक ही आत्मा के दो विस्तार की तरह दिखते हैं।
पटसन की चटकलों से बंधा पेट का रिश्ता
आजादी से पहले, जब अखंड बंगाल था, बिहार के हजारों मजदूर रोजी की तलाश में कलकत्ता से ढाका तक जाते थे। हुगली किनारे की चटकलें यानी जूट मिलें बिहार के मजदूरों के लिए छह महीने का सहारा नहीं, पूरे परिवार के साल भर की उम्मीद थीं।
उत्तर बिहार के लोगों के लिए यह यात्रा किसी तपस्या से कम न थी। पहले गंगा को स्टीमर से पार करना, फिर पटना से कलकत्ता तक रेल का सफर। बिहारी मजदूर जब लौटता था तो सिर्फ मजदूरी लेकर नहीं लौटता था। वह अपने साथ बंगाल की भाषा का एक शब्द, लुंगी का एक पहनावा, खाने का एक स्वाद और जीवन जीने की एक नई लय भी ले आता था। बिहार में लुंगी का आम होना इसी सांस्कृतिक आवाजाही की देन है।

बंगाल का सम्मोहन: सिर्फ रोजगार नहीं, एक मुक्ति का सपना
बिहार-बंगाल का रिश्ता केवल श्रम का नहीं, सम्मोहन का भी रहा है।
उस समय का बिहारी समाज रूढ़ियों की जकड़ में था, जहाँ स्त्रियों का संसार घर की चारदीवारी तक सीमित था। जब वही बिहारी मजदूर बंगाल के अपेक्षाकृत खुले समाज को देखता – स्त्रियों को सजते-संवरते, बाजार में आत्मविश्वास से चलते, सामाजिक जीवन में भाग लेते देखता, तो उसके भीतर एक नई दुनिया का द्वार खुलता।
वह बंगाल से सिर्फ कमाई नहीं, एक सपना भी लेकर लौटता था। एक अधिक मुक्त, अधिक सुंदर समाज का सपना।
लोकगीतों में बसा ‘पूरब’
इसीलिए बिहार के लोकमन में बंगाल इतना गहरा बसा है।
भिखारी ठाकुर का अमर नाटक ‘विदेसिया’ इसी इतिहास का सबसे सजीव दस्तावेज है। परदेस गया पति और पीछे छूट गई पत्नी की विरह-कथा। यह विरह केवल पति-पत्नी का नहीं, बल्कि बंगाल गए लाखों बिहारियों के परिवारों का सामूहिक विरह था। उस ‘विदेस’ में कलकत्ता की चमक और बंगाल की छाया साफ दिखती है।
भोजपुरी के महाकवि महेंद्र मिसिर ने जिसे ‘पूर्वी’ गायकी कहा, वह केवल दिशा नहीं थी। बिहार के लिए पूरब का अर्थ था – बंगाल की ओर खुलता रास्ता। शारदा सिन्हा के गीतों में ‘पनिया के जहाज’ और परदेस की जो टीस है, उसके पीछे वही स्टीमर, वही रेल के डिब्बे और वही इंतजार करती आँखें हैं।
निष्कर्ष
इसलिए जब आज भी किसी पुराने भोजपुरी गीत में ‘कलकत्ता’, ‘बंगाल’ या ‘परदेस’ का नाम आता है, तो वह केवल एक शब्द नहीं होता।
उसके पीछे हजारों मील की पैदल यात्राएं हैं, गंगा के स्टीमरों का शोर है, चटकलों की मशीनों की खट-खट है, गांव में चूल्हा फूंकती स्त्रियों की आंखों का इंतजार है, और लौटकर आए लोगों की आंखों में बसा एक नया संसार है।
बिहार के रग-रग में बंगाल इसलिए नहीं है कि वह उसका पड़ोसी है, बल्कि इसलिए है कि बिहार की कई पीढ़ियों ने वहां अपना पसीना बहाया है, अपना दुख जिया है, अपना प्रेम पाया है और अपनी लोकसंस्कृति में उसे हमेशा के लिए दर्ज कर लिया है।






