संतोष राज पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार
बिहार की राजनीति में लंबे समय बाद एक ऐसा चेहरा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा है जिसने सत्ता के गलियारों से लेकर गांव की चौपाल तक अपनी अलग पहचान बनाई है। नाम है सम्राट चौधरी। आज बिहार की जनता के बीच जाइए, चाय की दुकान से लेकर खेत के मेड़ तक एक ही चर्चा सुनाई देगी – “सम्राट है तो मुमकिन है।” आखिर क्या वजह है कि इतने कम समय में सम्राट चौधरी बिहार की जनता के सबसे पसंदीदा मुख्यमंत्री बन गए हैं और विपक्ष क्यों सिर्फ आह भरने पर मजबूर है? इस संपादकीय में इसका गहरा विश्लेषण कर रहे है वरिष्ठ पत्रकार संतोष राज पाण्डेय
1. विरासत नहीं, संघर्ष से निकला नेता
सम्राट चौधरी कोई पैराशूट नेता नहीं हैं। उनके पिता शकुनी चौधरी बिहार की राजनीति के बड़े स्तंभ रहे, लेकिन सम्राट ने अपनी पहचान अपने दम पर बनाई। 1999 में राबड़ी सरकार में मंत्री बनने से लेकर, राजद का दामन छोड़कर भाजपा में आना और 6 साल में प्रदेश अध्यक्ष से मुख्यमंत्री तक का सफर, ये संघर्ष की कहानी है। बिहार की जनता, खासकर युवा, ऐसे ही संघर्षशील नेता को पसंद करती है जो जमीन से जुड़ा हो। सम्राट जी में लोगों को अपना बेटा, अपना भाई दिखता है, कोई दिल्ली से थोपा गया नेता नहीं।
2. कुशवाहा ही नहीं, सर्वसमाज के नेता
बिहार की राजनीति जाति के इर्द-गिर्द घूमती है, ये सच है। सम्राट चौधरी कुशवाहा समाज से आते हैं जो यादव के बाद दूसरी सबसे बड़ी आबादी है। लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत ये है कि उन्होंने खुद को सिर्फ एक जाति तक सीमित नहीं रखा। मंच से वो कहते हैं – “मैं कुशवाहा का बेटा जरूर हूं, पर बिहार के हर वर्ग का सेवक हूं।” अति पिछड़ा, दलित, महादलित, सवर्ण – सभी वर्गों में उनकी स्वीकार्यता बढ़ी है। भाजपा की रणनीति और सम्राट का सामाजिक समीकरण, ये लव-कुश समीकरण को फिर से जिंदा कर रहा है जो कभी नीतीश कुमार की ताकत था।
3. प्रशासन पर कड़ा शिकंजा – सुशासन 2.0
दीपक कुमार जैसे नीतीश कुमार के करीबी और 8 साल से जमे हुए प्रधान सचिव को हटाकर सम्राट चौधरी ने साफ संदेश दिया है – “अब सरकार मेरे हिसाब से चलेगी, पुरानी परछाई से नहीं।” ये फैसला बिहार की जनता को पसंद आया। लोग चाहते थे कि मुख्यमंत्री अपने फैसले खुद लें। सम्राट चौधरी रोजाना सचिवालय में देर तक बैठते हैं, फाइलें खुद देखते हैं, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जिलों के डीएम-एसपी से सीधा संवाद करते हैं। अधिकारियों में अब काम करने का दबाव है। जनता कहती है – “पहले काम के लिए पटना जाना पड़ता था, अब मुख्यमंत्री खुद जिले में आकर हिसाब ले रहे हैं।”
4. विकास का नया मॉडल – परंपरा और आधुनिकता का संगम
जहां एक तरफ सम्राट सरकार गुरुकुलम विद्यापीठ, संस्कृत स्कूलों को फिर से खोलने और मदरसा बोर्ड को नया भवन देने जैसी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने वाली योजनाएं ला रही है, वहीं दूसरी तरफ Class 6 से कंप्यूटर अनिवार्य, हर स्कूल में स्मार्ट क्लास, 700 सरस्वती विद्या निकेतन को हाईटेक बनाने जैसे फैसले भविष्य की तैयारी हैं। ये विजन जनता को समझ आता है – बच्चा गीता भी पढ़े और कंप्यूटर कोड भी लिखे। यही तो नया बिहार है।
5. भाषा जो दिल को छूती है
सम्राट चौधरी की भाषा में बनावटीपन नहीं है। वो ठेठ बिहारी अंदाज में बात करते हैं, कभी-कभी गुस्से में भी। जनता को यही पसंद है। वो दिल्ली की लटके-झटके वाली हिंदी नहीं बोलते, वो पटना, मुंगेर, बक्सर की भाषा बोलते हैं। जब वो कहते हैं – “बिहार को बर्बाद करने वालों को छोड़ेंगे नहीं”, तो लोगों को लगता है कि हां, ये अपना आदमी बोल रहा है।
तो विपक्ष आह क्यों भर रहा है?
पहली आह – नेतृत्व का संकट: विपक्ष के पास आज सम्राट चौधरी के कद का कोई चेहरा नहीं है। राजद हो या अन्य दल, सभी पुराने चेहरों पर टिकी हैं। तेजस्वी यादव लाख कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सम्राट के प्रशासनिक अनुभव और आक्रामक शैली के सामने वो फीके पड़ रहे हैं।
दूसरी आह – सामाजिक समीकरण ध्वस्त: सम्राट चौधरी ने भाजपा के कोर वोटर सवर्ण + अति पिछड़ा + कुशवाहा वोट बैंक में सेंध नहीं, बल्कि उसे और मजबूत कर दिया है। कुशवाहा वोट जो कभी जदयू और राजद में बंटता था, अब मजबूती से भाजपा के साथ खड़ा दिख रहा है। इससे विपक्ष का MY समीकरण भी कमजोर पड़ रहा है।
तीसरी आह – मुद्दाविहीनता: विपक्ष के पास सरकार को घेरने के लिए कोई बड़ा मुद्दा नहीं बचा। भ्रष्टाचार पर सरकार जीरो टॉलरेंस की बात कर रही है, अपराधियों पर लगातार कार्रवाई हो रही है। अनंत सिंह जैसे बाहुबली भी जब ललन सिंह जैसे केंद्रीय मंत्री पर तंज कसते हैं, तो विपक्ष को लगता है कि अब तो उनके अपने लोग भी बिखर रहे हैं।
चौथी आह – जनता का मूड: सबसे बड़ी आह तो इस बात की है कि जनता का मूड विपक्ष के साथ नहीं है। ग्राउंड रिपोर्ट कहती है कि गांव-गांव में लोग कह रहे हैं – “सम्राट को एक मौका तो देना ही चाहिए, लड़का काम कर रहा है।” जब जनता ही सत्ता के साथ खड़ी हो जाए तो विपक्ष सिर्फ बयानबाजी और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सिमट कर रह जाता है।
निष्कर्ष
सम्राट चौधरी आज सिर्फ एक मुख्यमंत्री नहीं, बिहार के एक बड़े वर्ग की आकांक्षा बन गए हैं। वो बिहार को उस पुरानी छवि से निकालकर, जहां सिर्फ जाति और लाठी की बात होती थी, एक ऐसे बिहार की ओर ले जाना चाहते हैं जहां लैपटॉप और लाठी दोनों की बात हो, जहां विकास और विरासत दोनों साथ चलें। यही वजह है कि बिहार की जनता उन्हें पसंद कर रही है।
और विपक्ष? विपक्ष के पास अभी आह भरने के अलावा कोई चारा नहीं है, क्योंकि बिहार की जनता ने अपना सम्राट चुन लिया है। 2026 का बिहार अब पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहता, वो आगे दौड़ना चाहता है और उस दौड़ में सम्राट चौधरी सबसे आगे खड़े नजर आ रहे हैं।










