संतोष राज पाण्डेय
जनता दल यूनाइटेड ने आखिरकार वो फैसला ले ही लिया, जिसकी अटकलें पिछले कई हफ्तों से लग रही थीं। मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह उर्फ छोटे सरकार और उनकी पत्नी पूर्व विधायक नीलम देवी को पार्टी ने 6 साल के लिए प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया है। प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा के हस्ताक्षर से जारी पत्र में तीन आरोप बेहद साफ हैं – पार्टी निर्देशों की अवहेलना, शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग और विधान परिषद चुनाव में पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ जाकर जन सुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह का खुलेआम प्रचार करना। साथ ही पार्टी ने विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार से अनंत सिंह की विधायकी 10वीं अनुसूची (दलबदल कानून) के तहत समाप्त करने की भी सिफारिश की है।
कारण तात्कालिक तौर पर पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का MLC चुनाव बना। जदयू ने वहाँ अपने कद्दावर नेता नीरज कुमार को चौथी बार उतारा, लेकिन अनंत सिंह ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। अनंत सिंह का तर्क था कि नीरज कुमार ने पहले उनके खिलाफ काम किया था, इसलिए यह बदला है। लाख समझाने के बाद भी जब वे नहीं माने, तो जदयू को कार्रवाई करनी पड़ी।
अब सवाल है, इस कार्रवाई का जदयू पर असर क्या पड़ेगा?
1. अनुशासन का संदेश: नीतीश मॉडल की वापसी
नीतीश कुमार की राजनीति का मूलमंत्र हमेशा से रहा है – सुशासन और अनुशासन। पिछले कुछ वर्षों में जदयू पर आरोप लगते रहे हैं कि वह बाहुबलियों के आगे झुक जाती है। अनंत सिंह जैसे नेता, जिन पर हत्या, UAPA समेत कई गंभीर मामले हैं और जो 2025 का चुनाव हिरासत में रहते हुए जीते थे, को पार्टी में रखना सुशासन की छवि पर दाग था।
उन्हें निकाल कर जदयू ने अपने कोर वोटर – अति पिछड़ा, महादलित और सुशासन पसंद मध्यम वर्ग को एक साफ संदेश दिया है कि पार्टी किसी भी कीमत पर अनुशासन से समझौता नहीं करेगी। यह फैसला चुनाव से ठीक पहले नैतिक रूप से पार्टी को ऊँचा बनाता है।
2. मोकामा का किला ढहेगा? सबसे बड़ा नुकसान
इसका दूसरा पहलू कहीं ज्यादा जमीनी है। मोकामा 1990 से अनंत सिंह परिवार की जागीर है। एक छोटे अंतराल को छोड़ दें तो यह सीट हमेशा उनके पास रही है। यहाँ चुनाव व्यक्ति देख कर लड़ा जाता है, पार्टी देख कर नहीं। अनंत सिंह सिर्फ विधायक नहीं, एक सामाजिक व्यवस्था हैं। भूमिहार-ब्राह्मण वोटों पर उनकी पकड़ और राजपूतों में उनके भाई ललन सिंह का प्रभाव जदयू के लिए NDA के सामाजिक समीकरण का आधार था।
अनंत सिंह के निकलने से मोकामा-बाढ़-मुंगेर की पूरी बेल्ट में जदयू संगठनात्मक रूप से कमजोर होगी। 2025 में उनकी पत्नी ने पाला बदल कर NDA का साथ दिया था, अब दोनों के जाने से वह पूरा वोट बैंक एक बार फिर खुला हो गया है।
3. जन सुराज के लिए संजीवनी
अनंत सिंह ने जिस अनुज सिंह का समर्थन किया, वह जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार हैं। प्रशांत किशोर की पार्टी बिहार में तीसरे विकल्प के तौर पर खुद को स्थापित करने की कोशिश कर रही है। विधान परिषद की स्नातक सीट का चुनाव भले ही छोटा लगे, लेकिन इसका सिंबल बड़ा है। अगर जन सुराज का उम्मीदवार इस सीट पर जदयू के आधिकारिक प्रत्याशी को हरा देता है, जिसका परिणाम 27 अक्टूबर को आना है, तो यह जदयू के लिए दोहरी हार होगी – अपना उम्मीदवार हारा और जिस बागी को निकाला, वह जीत का हीरो बन गया।
4. बाहुबली राजनीति से दूरी या मजबूरी?
बिहार में बाहुबली राजनीति एक सच्चाई है। जदयू ने लंबे समय तक बाहुबलियों को साध कर सत्ता का संतुलन बनाया। अनंत सिंह को निकालना इस मॉडल से ब्रेक है। इससे ललन सिंह जैसे नेता असहज हो सकते हैं, जिन्होंने शुरुआत में अनंत सिंह के कदम को जायज ठहराया था।
लेकिन दूसरी तरफ भाजपा चाहती है कि जदयू अपनी छवि साफ करे ताकि NDA पर जंगलराज के दाग का हमला न हो सके। इस लिहाज से यह फैसला NDA के बड़े हित में भी है।
निष्कर्ष: तात्कालिक नुकसान, दीर्घकालिक लाभ
अनंत सिंह को निकालने से जदयू को मोकामा में तात्कालिक रूप से एक विधायक, एक मजबूत जातीय समीकरण और एक संगठनकर्ता का नुकसान हुआ है। उपचुनाव में पार्टी को कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी।
लेकिन दीर्घकालिक रूप से देखें तो नीतीश कुमार ने वही किया जो उनकी राजनीति की पहचान है – सख्त निर्णय। यह संदेश साफ है कि जदयू में कोई भी नेता पार्टी से बड़ा नहीं है, चाहे वह कितना भी बड़ा बाहुबली क्यों न हो। बिहार की नई पीढ़ी, जो जाति से ज्यादा विकास और कानून-व्यवस्था देख कर वोट देती है, इस फैसले को सकारात्मक रूप में देखेगी।
अनंत सिंह का अगला कदम क्या होगा – क्या वे जन सुराज में जाएंगे, राजद में लौटेंगे या निर्दलीय रह कर अपनी ताकत दिखाएंगे, यही तय करेगा कि जदयू को इस निष्कासन की असली कीमत कितनी चुकानी पड़ेगी।










