संतोष राज पाण्डेय
विनय कुमार की ‘लंबी छुट्टी’ – छुट्टी नहीं, शतरंज की चाल?
प्रीता वर्मा को प्रभारी डीजीपी बनाना सिर्फ तात्कालिक व्यवस्था नहीं, मार्च 2027 तक सीनियॉरिटी की पूरी लाइन साफ करने की तैयारी!
बिहार के पुलिस महानिदेशक विनय कुमार 15 सितंबर से 5 अक्टूबर 2026 तक 21 दिनों के अवकाश पर हैं। गृह विभाग के आदेश के अनुसार उनकी अनुपस्थिति में 1991 बैच की IPS अधिकारी प्रीता वर्मा को DGP का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है।
विनय कुमार का वर्तमान कार्यकाल दिसंबर 2026 में समाप्त होना है। इसी के साथ बिहार के अगले DGP के चयन की प्रक्रिया भी चर्चा में है। विभिन्न रिपोर्टों में प्रीता वर्मा, कुंदन कृष्णन, जितेंद्र कुमार, जितेंद्र सिंह गंगवार और भृगु श्रीनिवासन समेत कई वरिष्ठ IPS अधिकारियों के नाम संभावित दावेदारों के रूप में सामने आए हैं।
ऐसे में विनय कुमार की छुट्टी और प्रीता वर्मा को मिला अतिरिक्त प्रभार स्वाभाविक रूप से बिहार पुलिस के अगले नेतृत्व को लेकर चर्चाओं को तेज करता है। हालांकि, कुंदन कृष्णन या किसी राजनीतिक व्यक्ति के प्रभाव, अथवा किसी खास रणनीति के तहत अधिकारियों की “लाइन साफ” करने का दावा फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक जानकारी से पुष्ट नहीं होता।
फिल्म गंगाजल में तेजपुर के एसपी अमित कुमार जब ‘लंबी छुट्टी’ पर जाते हैं, तो वह छुट्टी नहीं होती। वह सत्ता का संदेश होता है। बिहार पुलिस मुख्यालय में भी ठीक वही पटकथा दोहराई जा रही है।
डीजीपी विनय कुमार अचानक लंबी छुट्टी पर हैं। गृह विभाग ने 1991 बैच की आईपीएस प्रीता वर्मा को प्रभारी डीजीपी का चार्ज दे दिया है। आदेश फाइल में है, लेकिन असली फाइल कहीं और चल रही है।
सवाल ये नहीं है कि विनय कुमार छुट्टी पर क्यों गए। सवाल ये है कि उनके जाने से किसकी राह आसान हुई है?
- खेल डीजीपी की कुर्सी का है
विनय कुमार का कार्यकाल अभी साढ़े तीन महीने बाकी था। ब्यूरोक्रेसी में कार्यकाल से 100 दिन पहले यूं छुट्टी पर जाना, वापसी का नहीं, विदाई का संकेत होता है। आईपीएस लॉबी में चर्चा है कि उनकी पुलिस मुख्यालय में वापसी अब लगभग नामुमकिन है।
अब गणित समझिए।
अगर प्रीता वर्मा मार्च 2027 तक प्रभारी बनी रहती हैं, तो इस बीच डीजीपी रेस में कुंदन कृष्णन से सीनियर कई अधिकारी रिटायर हो जाएंगे। जो आज सीनियॉरिटी में उनसे ऊपर हैं, कल वे दौड़ से बाहर होंगे। लाइन छोटी होगी, और सबसे मजबूत पॉलिटिकल लॉबी वाले अधिकारी यानी कुंदन कृष्णन की दावेदारी ऑटोमेटिक सबसे मजबूत हो जाएगी।
यह प्रशासनिक फेरबदल नहीं, शतरंज की बिसात है।
चाल 1: मौजूदा डीजीपी की समय से पहले विदाई।
चाल 2: भरोसेमंद प्रभारी की नियुक्ति।
चाल 3: वरिष्ठों का रिटायरमेंट।
चाल 4: रेस में सीमित विकल्प, और मनचाहे चेहरे की ताजपोशी।
फायदा किसे? जवाब – कुंदन कृष्णन।
- निशाना सिर्फ पुलिस नहीं, सियासत है
इस कहानी का दूसरा किरदार वर्दी में नहीं, कुर्ते में है।
सत्ता के गलियारों में एक चर्चा और तेज है – केंद्रीय मंत्री और जेडीयू सांसद ललन सिंह की पकड़ ब्यूरोक्रेसी पर कमजोर पड़ी है। विनय कुमार को ललन सिंह कैंप के करीबी के तौर पर देखा जाता रहा है।
ऐसे में उनकी विदाई सिर्फ एक आईपीएस का जाना नहीं, बल्कि ललन सिंह के प्रशासनिक प्रभाव के कमजोर होने का बड़ा राजनीतिक संदेश भी है। जब पुलिस मुख्यालय का मुखिया बदलता है, तो थानों का नहीं, सत्ता के शक्ति-संतुलन का नक्शा बदलता है।
- विनय कुमार के लिए नया ठिकाना?
कहा जा रहा है कि विनय कुमार को अपमानजनक तरीके से हटाकर नहीं, बल्कि सम्मानजनक विदाई देकर राज्य सूचना आयुक्त बनाए जाने पर मंथन चल रहा है। यह होगा तो सरकार के लिए आसान होगा – न हंगामा होगा, न सवाल उठेगा कि सीनियर डीजीपी को क्यों हटाया।
- अगला नंबर किसका?
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। सूत्रों का दावा है कि एक बेहद महत्वपूर्ण जिले के तेज-तर्रार पुलिस कप्तान पर भी ऊपर की नजर है। विनय कुमार के बाद अगली बारी उनकी हो सकती है। इसका मतलब साफ है – बदलाव सिर्फ डीजीपी ऑफिस में नहीं, ऊपर से नीचे तक पूरे समीकरण बदले जा रहे हैं।
निष्कर्ष: यह महज छुट्टी की फाइल नहीं है। यह 2027 से पहले बिहार की पुलिस और सियासत दोनों की नई पटकथा लिखने की तैयारी है। देखना होगा कि यह ‘लंबी छुट्टी’ वाकई में छुट्टी बनती है या किसी बड़े राजनीतिक रिटायरमेंट की शुरुआत।







