- संतोष राज पाण्डेय
जुलाई से सितंबर, बिहार के लिए त्योहार नहीं, तबाही के महीने होते हैं। एक तरफ लोग छठ की तैयारी का सपना देखते हैं, दूसरी तरफ गंडक, कोसी, बागमती अपने साथ घर, खेत और उम्मीदें बहा ले जाती है। गोपालगंज में डुमरिया घाट पर सचिव और DM को निरीक्षण करना पड़ रहा है, सहरसा में तटबंध टूट रहा है, दरभंगा में स्कूल नाव में बदल गए हैं। सवाल एक ही है – आजादी के 78 साल बाद भी बिहार हर साल क्यों डूबता है? क्या बाढ़ बिहार की किस्मत है या हमारे सिस्टम की नाकामी?
1. बिहार में बाढ़ क्यों आती है? – असली कारण समझिए
बिहार की बाढ़ सिर्फ पानी नहीं, 5 बड़े कारणों का गठजोड़ है:
A) नेपाल का पानी, बिहार की तबाही:
बिहार की 8 बड़ी नदियों में से 7 नेपाल से आती हैं – गंडक, कोसी, बागमती, कमला, महानंदा, परमान। नेपाल में जब भारी बारिश होती है, तो वहाँ के बैराज एक साथ पानी छोड़ देते हैं। 30-40 लाख क्यूसेक पानी सीधे बिहार के मैदानी इलाकों में घुस जाता है। बिहार के पास उसे रोकने का कोई सिस्टम नहीं है। हम सिर्फ देखते हैं और डूबते हैं।
B) नदियों की ऊँची पेटी – नदी नहीं, नाला बन गई:
कोसी नदी का तल हर साल 5-7 सेंटीमीटर ऊँचा हो रहा है क्योंकि नेपाल से आने वाला बालू और गाद (Silt) नदी के पेट में जमा हो रहा है। नदी का पेट भर गया, पानी बाहर निकलेगा ही। इसी को विशेषज्ञ ‘Siltation’ कहते हैं। कोसी को कभी ‘बिहार का शोक’ कहा जाता था, आज भी वही है।
C) फरक्का बैराज – बंगाल बचा, बिहार डूबा:
1975 में बना फरक्का बैराज बिहार के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गया। गंगा का पानी फरक्का पर रुकता है, बिहार में बैक-वॉटर इफेक्ट से पानी उल्टा बहने लगता है। पटना से लेकर भागलपुर तक गंगा का जलस्तर फरक्का की वजह से 2-3 फीट ज्यादा रहता है।
D) तटबंध – सुरक्षा नहीं, मौत के फंदे:
बिहार में 3500 KM से ज्यादा तटबंध हैं। अंग्रेजों के जमाने की सोच है – नदी को बांध दो। लेकिन नदी को बांधोगे तो वह ज्यादा गुस्सैल होगी। 2008 में कोसी तटबंध टूटा तो 30 लाख लोग बेघर हो गए थे। हर साल तटबंध के अंदर पानी फँस जाता है, लोग टापू बन जाते हैं। तटबंध में भ्रष्टाचार अलग से – हर साल मरम्मत के नाम पर 500 करोड़ का खेल।
E) अतिक्रमण और जलवायु परिवर्तन:
नदियों के किनारे बसे शहर, नालों पर बनी कॉलोनियां। पटना का 70% पानी निकलने का रास्ता बंद है। ऊपर से क्लाइमेट चेंज – अब बारिश 15 दिन में 60 दिन की हो रही है। कम समय में ज्यादा पानी, और हमारा ड्रेनेज सिस्टम 1970 का।
2. बाढ़ का दर्द क्या होता है? – सिर्फ आंकड़ा नहीं, जिंदगी है
बिहार में हर साल औसतन 25 लाख हेक्टेयर जमीन डूबती है, 70 लाख लोग प्रभावित होते हैं, 300 से ज्यादा जानें जाती हैं। लेकिन आंकड़ों के पीछे कहानी देखिए:
- एक किसान ने 3 महीने मेहनत से धान लगाया, एक रात में सब बह गया। अब वो 2 साल तक कर्ज में रहेगा।
- बैकुंठपुर की एक माँ अपने बच्चे को प्लास्टिक की टब में लेकर तटबंध पर 15 दिन रही।
- गोपालगंज में सामुदायिक रसोई चल रही है, लेकिन लोग पूछ रहे हैं – हमें रसोई नहीं, समाधान चाहिए।
बाढ़ हर साल बिहार को 5000 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान पहुँचाती है। यह पैसा अगर शिक्षा और उद्योग में लगता तो बिहार आज कहाँ होता?
3. स्थायी निदान क्या है? – रसोई और नाव से काम नहीं चलेगा
सरकार राहत दे रही है, यह अच्छी बात है। लेकिन कब तक? हमें इलाज नहीं, बीमारी खत्म करनी है।
तत्काल उपाय (0-2 साल):
- नेपाल के साथ रियल-टाइम वाटर ट्रीटी: अभी नेपाल पानी छोड़ता है तब हमें पता चलता है। नेपाल के सभी बैराज पर ज्वाइंट सेंसर और 48 घंटे पहले अलर्ट सिस्टम अनिवार्य हो। बिहार में एक सेंट्रल फ्लड वॉर्निंग कमांड सेंटर बने।
- तटबंधों का ऑडिट: CBI या थर्ड पार्टी से हर तटबंध की मजबूती की जाँच। जहाँ भ्रष्टाचार है, वहाँ इंजीनियर पर केस।
- नदियों की सफाई: हर साल ड्रेजिंग (गाद निकालना) को अनिवार्य किया जाए। कोसी और गंडक से निकला बालू बेचकर सरकार पैसा भी कमा सकती है।
मध्यकालीन उपाय (2-5 साल):
- कोसी-गंडक लिंक और बड़े जलाशय: नेपाल में सप्तकोसी हाई डैम का निर्माण। यह डैम बाढ़ के 70% पानी को रोक लेगा और 3000 MW बिजली भी देगा। केंद्र सरकार को इसे नेशनल प्रोजेक्ट घोषित करना होगा।
- बाढ़ के पानी को स्टोर करो: बिहार में 20 छोटे-बड़े रिजरवायर (तालाब) बनें जहाँ बाढ़ का पानी स्टोर हो और गर्मी में सिंचाई में काम आए। गुजरात ने ऐसा किया है।
- तटबंध नहीं, Flood Plain बनाओ: दुनिया अब तटबंध नहीं बना रही। नीदरलैंड की तरह नदी को जगह दो। नदी के दोनों तरफ 500 मीटर नो-कंस्ट्रक्शन जोन। लोगों को वहाँ से सम्मान के साथ शिफ्ट करके जमीन का मुआवजा।
दीर्घकालीन उपाय (5-20 साल) – बिहार को बचाना है तो सोचना पड़ेगा:
- बिहार जल आयोग: सिर्फ जल संसाधन विभाग नहीं, IIT पटना, विशेषज्ञ और किसानों को मिलाकर एक स्वतंत्र आयोग जो राजनीति से ऊपर हो।
- बाढ़ आधारित खेती: बाढ़ को दुश्मन नहीं, दोस्त बनाओ। बाढ़ वाले क्षेत्रों में धान की जगह मखाना, सिंघाड़ा, मत्स्य पालन को बढ़ावा। बाढ़ का पानी ही कमाई बन जाए।
- स्मार्ट विलेज: हर पंचायत में ऊँचे प्लेटफॉर्म पर बाढ़ आश्रय स्थल, सोलर नाव, और कम्युनिटी रेडियो।
4. आखिर में – बिहार कब तक भीख मांगेगा?
बिहार के लोग मेहनती हैं, लेकिन हर साल बाढ़ उनकी मेहनत धो देती है। हम हर साल केंद्र से 1000 करोड़ की राहत मांगते हैं, लेकिन 10,000 करोड़ का स्थायी समाधान नहीं मांगते। नेपाल से पानी पर बात नहीं करते, फरक्का पर चुप रहते हैं।
डुमरिया घाट पर आज सचिव और DM निरीक्षण कर रहे हैं, यह उनका कर्तव्य है। लेकिन सच्ची पत्रकारिता का कर्तव्य है सवाल पूछना – सर, निरीक्षण हर साल होता है, समाधान कब होगा?
बिहार को रसोई नहीं, रास्ता चाहिए। नाव नहीं, निजात चाहिए।
💐💐संतोष राज पाण्डेय💐💐







