आध्यात्मिक गुरु पं. कमलापति त्रिपाठी प्रमोद
नवरात्रि केवल पर्व नहीं, आत्मशुद्धि की यात्रा है
सनातन परंपरा में नवरात्रि को शक्ति की आराधना का सर्वोच्च पर्व माना गया है। यह नौ दिन शरीर, मन और जीवन को संयमित करने की साधना है। इस विषय पर आध्यात्मिक गुरु पं. कमलापति त्रिपाठी प्रमोद जी ने नवरात्रि साधना के गूढ़ रहस्यों को बड़े ही सरल शब्दों में समझाया है।

1. मंत्र – देवी शक्ति का शब्दरूप
सनातन परंपरा में मंत्र को देवी-शक्ति का शब्दरूप माना गया है। नवरात्रि में माँ भगवती के मंत्रों का उच्चारण मन को एकाग्र करने और साधना को व्यवस्थित करने का माध्यम है।
साधारण गृहस्थ भक्त के लिए सबसे सरल और प्रभावी मंत्र है – ॐ दुं दुर्गायै नमः।
इसका श्रद्धापूर्वक जाप प्रातः या संध्या में किया जा सकता है। संख्या से अधिक महत्वपूर्ण श्रद्धा, शुद्ध उच्चारण और एकाग्रता है। जो संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का पाठ न कर सके, वह दुर्गा चालीसा, देवी स्तुति अथवा सरल मंत्र-जाप भी कर सकता है।
2. जाप का महत्व – मन को देवी में लगाना
जप का अर्थ है – मंत्र को बार-बार स्मरण करना। माला से 108 बार जाप प्रचलित है, लेकिन अनिवार्य संख्या मानना आवश्यक नहीं।
जाप की विधि: स्वच्छ स्थान पर बैठें, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें, दीपक जलाएं, कुछ क्षण शांत होकर माँ का ध्यान करें, फिर मंत्र का जाप करें और अंत में अपनी प्रार्थना रखें।
3. तप और व्रत – संयम ही असली साधना
गुरु जी कहते हैं, तप का अर्थ केवल शरीर को कष्ट देना नहीं है। तप का वास्तविक अर्थ है – संयम, अनुशासन और अपनी इंद्रियों तथा मन को साधना। माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप स्वयं तपस्या और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है।
नवरात्रि में तप का अर्थ है – कम बोलना, सत्य बोलना, क्रोध पर नियंत्रण, सात्त्विक भोजन, निंदा से बचना और सेवा करना।
वहीं व्रत का मूल भाव है – किसी श्रेष्ठ संकल्प पर दृढ़ रहना। यह केवल भोजन छोड़ना नहीं, बल्कि मन और इंद्रियों पर संयम का अभ्यास है। व्रत में फल, दूध, मखाना, कुट्टू, सिंघाड़ा आदि सात्त्विक आहार लिया जाता है, लेकिन स्वास्थ्य बिगाड़कर व्रत करना उचित नहीं।
4. नवरात्रि की सरल दैनिक साधना-विधि
प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें, पूजा स्थान को स्वच्छ कर दीपक जलाएं, गणेश जी का स्मरण कर माँ भगवती का ध्यान करें, पुष्प, अक्षत, धूप अर्पित कर ॐ दुं दुर्गायै नमः का जाप करें, चालीसा/स्तुति करें और आरती करें। दिनभर सात्त्विक आचरण बनाए रखें और संध्या में पुनः दीपक जलाकर ध्यान करें।
5. 2026 शारदीय नवरात्रि – नवदुर्गा, प्रचलित भोग और कन्या पूजन का रहस्य

नवरात्रि में नवदुर्गा के साथ भोग की परंपरा क्षेत्र के अनुसार बदलती है, लेकिन उत्तर भारतीय परंपरा में यह भोग प्रचलित हैं:
- प्रतिपदा – माँ शैलपुत्री – भोग: गाय का घी
- द्वितीया – माँ ब्रह्मचारिणी – भोग: मिश्री एवं फल
- तृतीया – माँ चंद्रघंटा – भोग: दूध/खीर
- चतुर्थी – माँ कूष्मांडा – भोग: मालपुआ
- पंचमी – माँ स्कंदमाता – भोग: केला
- षष्ठी – माँ कात्यायनी – भोग: शहद
- सप्तमी – माँ कालरात्रि – भोग: गुड़
- अष्टमी – माँ महागौरी – भोग: नारियल
- नवमी – माँ सिद्धिदात्री – भोग: तिल, हलवा-पूरी-चना
देवी भागवत के अनुसार कन्या पूजन का विधान:
देवी भागवत में कन्या को स्वयं देवी का स्वरूप माना गया है।
- 2 वर्ष – कुमारी, 3 वर्ष – त्रिमूर्ति, 4 वर्ष – कल्याणी, 5 वर्ष – रोहिणी, 6 वर्ष – कालिका, 7 वर्ष – चंडिका, 8 वर्ष – शाम्भवी, 9 वर्ष – दुर्गा, 10 वर्ष – सुभद्रा
1 वर्ष की कन्या का पूजन इस विधान में नहीं है और 10 वर्ष से अधिक आयु की कन्या इस विशेष कुमारी-पूजन के लिए नहीं ली जाती।
6. नवरात्रि का सबसे बड़ा संदेश
गुरु जी कहते हैं, नवरात्रि हमें तीन स्तरों पर साधना सिखाती है –
व्रत – शरीर पर संयम। जप – मन पर संयम। तप – जीवन और व्यवहार पर संयम।
और जब इन तीनों के साथ सेवा, करुणा और सदाचार जुड़ जाते हैं, तभी नवरात्रि की साधना जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाती है।
– आध्यात्मिक गुरु पं. कमलापति त्रिपाठी प्रमोद जी के प्रवचन पर आधारित
संकलन – संतोष राज पाण्डेय | STAR INDIA NOW






