संतोष राज पाण्डेय
बिहार में शिक्षा हमेशा से सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा रहा है। सड़क, बिजली, पानी के साथ-साथ सरकारी स्कूलों की बदहाली हर चुनाव का मुद्दा बनती है। ऐसे में जब गोपालगंज के कद्दावर भाजपा नेता मिथिलेश तिवारी को बिहार का शिक्षा मंत्री बनाया गया, तो सबकी नजरें उनकी योजनाओं पर टिकीं। क्या एक अनुभवी राजनेता और संगठनकर्ता के रूप में वे बिहार की शिक्षा व्यवस्था को निजी स्कूलों के बराबर खड़ा कर पाएंगे? आइए उनकी 5 बड़ी योजनाओं को आंकड़ों और जमीनी हकीकत पर परखते हैं।
1. हर जिले में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस – प्राइवेट स्कूलों को सीधी टक्कर
मिथिलेश तिवारी की सबसे चर्चित योजना है – बिहार के 38 जिलों में 38 सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्कूल।
शिक्षा मंत्री के अनुसार हर जिले के एक पुराने, प्रतिष्ठित और बेहतर रिजल्ट वाले सरकारी स्कूल को चुना जाएगा। उसे पूरी तरह से हाईटेक बनाया जाएगा। इसमें क्या होगा?
- डिजिटल क्लासरूम, ICT लैब, प्रोजेक्टर, हाई स्पीड इंटरनेट
- फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी की मॉडर्न लैब
- लाइब्रेरी, बेहतर शौचालय, पेयजल, बड़ा खेल मैदान
- रोबोटिक्स, कोडिंग, AI की पढ़ाई, करियर काउंसलिंग
- क्विज, स्पोर्ट्स, सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं और लीडरशिप ट्रेनिंग
सरकार का दावा है कि ये स्कूल राष्ट्रीय स्तर के प्राइवेट स्कूलों जैसी सुविधा देंगे। यह योजना सुनने में क्रांतिकारी है।
कितनी सफल होगी?
सफलता की पहली शर्त है चयन पारदर्शी हो। बिहार में पहले भी मॉडल स्कूल, उत्कृष्ट विद्यालय जैसी योजनाएं आईं, लेकिन रखरखाव के अभाव में वे दम तोड़ गईं। अगर 38 स्कूलों को सच में सालाना मेंटेनेंस बजट, प्रशिक्षित शिक्षक और स्वायत्तता दी गई तो यह मॉडल हिट हो सकता है। सिवान, गोपालगंज, पटना जैसे जिलों में जहां जमीन और पुराने प्रतिष्ठित स्कूल उपलब्ध हैं, वहां यह तुरंत सफल होगा। लेकिन चुनौती है – 38 स्कूलों से 72,000 से ज्यादा सरकारी स्कूलों की तस्वीर नहीं बदलेगी। इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में देखना होगा।
2. क्लास 6 से 12 तक कंप्यूटर शिक्षा अनिवार्य – 2027 से बड़ा बदलाव
10 अक्टूबर को पटना में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के साथ बैठक में मिथिलेश तिवारी ने ऐलान किया – 2027 के सत्र से क्लास 6 से 12 तक कंप्यूटर शिक्षा अनिवार्य होगी।
इसके लिए बिहार में 3,818 ICT लैब की प्रगति की समीक्षा हुई है। 9,000 से अधिक माध्यमिक-उच्च माध्यमिक स्कूलों में मॉडल सुविधाएं, 10,531 विज्ञान प्रयोगशालाओं को हाईटेक बनाने और 700 मॉडल स्कूलों को मजबूत करने का लक्ष्य रखा गया है।
कितना व्यावहारिक है?
बिहार में आज भी हजारों स्कूलों में बिजली और एक कंप्यूटर टीचर तक नहीं है। अनिवार्य करने से पहले दो काम जरूरी हैं – हर स्कूल में कम से कम 10 कंप्यूटर, इंटरनेट और एक स्थायी कंप्यूटर शिक्षक। मंत्री जी ने इसके लिए 1,520 नए स्कूल भवनों के लिए 2000 करोड़ रुपये केंद्र से मांगे हैं। अगर केंद्र से यह राशि आ जाती है तो 2027 का लक्ष्य संभव है। नहीं तो यह योजना भी कागज पर रह जाएगी।
3. शिक्षकों को AI और रोबोटिक्स की ट्रेनिंग – सबसे मजबूत पक्ष
मिथिलेश तिवारी ने समस्तीपुर में जो कहा वह सबसे प्रैक्टिकल लगा – शिक्षकों की 40% समस्याएं सुलझा दी गई हैं, बाकी 60% डेढ़ महीने में सुलझाई जाएंगी। साथ ही शिक्षकों को AI और रोबोटिक्स की ट्रेनिंग दी जाएगी। फाइल पर हस्ताक्षर हो चुके हैं।
साथ ही वित्त रहित शिक्षकों के लिए ऐतिहासिक फैसला – अब अनुदान प्रबंधन समिति के बजाय सीधे शिक्षकों के बैंक खाते में जाएगा। इससे भ्रष्टाचार रुकेगा। लाइब्रेरियन की बहाली का रास्ता भी खोला जा रहा है।
यह योजना क्यों सफल मानी जा रही है?
बिहार के शिक्षक तकनीक से डरते नहीं, बल्कि उन्हें सिखाया ही नहीं गया। अगर सच में DIET और SCERT के जरिए चरणबद्ध ट्रेनिंग हुई तो सरकारी शिक्षक प्राइवेट से बेहतर पढ़ा सकते हैं। वित्त रहित शिक्षकों को सीधा पैसा – यह 30 साल पुरानी मांग थी, जिसे तिवारी ने माना। इससे उनका मनोबल बढ़ेगा।
4. मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा – भोजपुरी, मगही, मैथिली, अंगिका
मंत्री जी ने SCERT को निर्देश दिया है कि क्लास 1 से 5 तक के बच्चों को हिंदी के साथ-साथ उनकी मातृभाषा भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका में भी पढ़ाया जाए।
शोध कहते हैं बच्चा अपनी भाषा में तेजी से सीखता है। सिवान, छपरा, गोपालगंज के भोजपुरी भाषी बच्चे के लिए यह वरदान होगा। इससे ड्रॉप आउट रेट घटेगा।
चुनौती क्या है?
किताबें कौन लिखेगा? शिक्षकों को इन भाषाओं में ट्रेनिंग कौन देगा? SCERT में हजारों पद खाली हैं। अगर BPSC से भर्ती तेज नहीं हुई तो किताबें छप जाएंगी पर पढ़ाने वाला नहीं मिलेगा।
5. मिड डे मील में सुधार – गर्म और सुरक्षित भोजन
जुलाई में मिड डे मील में छिपकली मिलने की घटनाओं के बाद तिवारी ने सख्त फैसला लिया – दो महीने में स्टील की जगह इंसुलेटेड बर्तन अनिवार्य, खाना बनने से परोसने तक का समय 3-4 घंटे से ज्यादा नहीं।
यह छोटे लेकिन असरदार फैसले हैं। अभिभावकों का भरोसा तभी लौटेगा जब बच्चा स्कूल में सुरक्षित खाना खाएगा।
मंत्री जी कितने सफल हैं अब तक? – निष्पक्ष मूल्यांकन
सकारात्मक पक्ष:
- वे केवल भवन नहीं, गुणवत्ता की बात कर रहे हैं – AI, कोडिंग, करियर की बात, जो पहले कोई मंत्री नहीं करता था।
- केंद्र से समन्वय मजबूत है। 2000 करोड़ की मांग पर केंद्रीय मंत्री ने दिल्ली में विचार का आश्वासन दिया है।
- वित्त रहित शिक्षकों और मातृभाषा जैसे जमीन से जुड़े मुद्दे उठाए हैं।
कमजोर कड़ी और सवाल:
- बिहार में 3 लाख से ज्यादा शिक्षकों के पद खाली हैं। सेंटर ऑफ एक्सीलेंस तब तक नहीं चलेगा जब तक शिक्षक नहीं होंगे।
- योजनाओं का बजट बहुत बड़ा है। राज्य का शिक्षा बजट पहले से ही वेतन में खत्म हो जाता है।
- कार्यान्वयन – बिहार में योजना बनना बड़ी बात नहीं, उसे जमीन पर उतारना बड़ी बात है।
निष्कर्ष – क्या योजना सफल हो पाएगी?
हां, हो सकती है, लेकिन 3 शर्तों पर।
पहली – पायलट से मास स्केल। 38 सेंटर ऑफ एक्सीलेंस को शोकेस न बनाकर हर प्रखंड में एक ऐसा स्कूल बनाना होगा।
दूसरी – शिक्षक भर्ती और ट्रेनिंग। AI-रोबोटिक्स की ट्रेनिंग के साथ-साथ 1 लाख कंप्यूटर शिक्षकों और विज्ञान शिक्षकों की नियमित भर्ती।
तीसरी – निगरानी। हर योजना की थर्ड पार्टी ऑडिट और सोशल ऑडिट। मिड डे मील की तरह हर स्कूल में CCTV और हेल्पलाइन।
मिथिलेश तिवारी एक अनुभवी राजनेता हैं, वे गोपालगंज में पीएम आवास योजना में 80% लक्ष्य पूरा करवा चुके हैं, जो उनकी कार्यशैली दिखाता है। अगर वे शिक्षा में भी उसी गति से काम करें, तो 2027 तक बिहार के सरकारी स्कूलों की तस्वीर सच में बदल सकती है।
आज बिहार के अभिभावक प्राइवेट स्कूलों में 500-1000 रुपये महीना देने को मजबूर हैं, क्योंकि सरकारी स्कूल में विश्वास नहीं। अगर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में सच में प्राइवेट जैसी पढ़ाई, कंप्यूटर, खेल और करियर की सुविधा मिली, तो वह भरोसा लौटेगा।
अंत में – मंत्री जी की योजनाएं कागज पर 100% सफल हैं, जमीन पर 60% सफल हैं। बाकी 40% सफलता केंद्र से पैसा, शिक्षक भर्ती और स्थानीय अधिकारियों की ईमानदारी पर टिकी है। अगर ये तीनों मिल गए, तो मिथिलेश तिवारी बिहार के शिक्षा इतिहास में सबसे सफल मंत्री के रूप में याद किए जाएंगे, नहीं तो यह भी एक और अच्छी योजना बनकर फाइल में रह जाएगी।
बिहार जैसे भोजपुरी क्षेत्र के लिए तो यह योजना विशेष मायने रखती है – क्योंकि यहीं से पलायन सबसे ज्यादा होता है और अच्छी शिक्षा ही पलायन रोक सकती है।






