संतोष राज पाण्डेय,पटना
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बिहार की धरती हमेशा से प्रतिभाओं की जननी रही है। इसी धरती के पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित सरोत्तर गांव में जन्मे राकेश पाण्डेय की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है, जो आज दुनिया के 17 देशों में अपनी पहचान बना चुके हैं। 38d0
बचपन में गरीबी, आंखों में बड़े सपने
मोतिहारी के एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे राकेश पाण्डेय ने बचपन में घोर गरीबी देखी। प्रारंभिक शिक्षा अनियमित रही। दिल्ली आकर अपने सपने पूरे करने के लिए उन्होंने वेटर तक की नौकरी की, हॉकर का काम किया। एक बार पटना में फिल्म ‘खलनायक’ की टिकट खरीदकर उसे ब्लैक में बेचकर उन्होंने रेसनिक की किताब खरीदी थी। यही जुनून उन्हें दिल्ली यूनिवर्सिटी तक ले गया। उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी, जर्मन, रशियन और संस्कृत – पांच भाषाएं सीखीं।

ब्रावो फार्मा – एक ग्लोबल साम्राज्य
2004 में EPC के क्षेत्र में कारोबार शुरू किया, 2008-09 में ब्रावो फार्मा की स्थापना की। आज ब्रावो फार्मा यूके, भारत, अमेरिका, अफ्रीका, यूरोप, रूस, मध्य एशिया समेत 9 देशों में कैंसर, HIV, लीवर डिजीज पर रिसर्च और दवा निर्माण कर रही है। लंदन में रहकर वे इस ग्लोबल कंपनी के CMD के रूप में काम देखते हैं। कंपनी का फोकस है – Diagnosis, Doctor और Drug – स्वास्थ्य के 3D को एक साथ जोड़ना। वे जॉन हॉपकिन्स कैंसर हॉस्पिटल, USA के साथ पैंक्रियाटिक कैंसर पर बायोमार्कर डेवलपमेंट में काम कर रहे हैं।
ब्रावो फाउंडेशन – सेवा ही संकल्प
राकेश पाण्डेय सिर्फ उद्यमी नहीं, बल्कि एक बड़े समाजसेवी हैं। उन्होंने समाज को वापस देने के लिए ब्रावो फाउंडेशन की स्थापना की। फाउंडेशन की कल्याणकारी गतिविधियां किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं।
फाउंडेशन ने 2015-17 के बीच अपने निजी फंड से 1364 बच्चों को कैंसर के इलाज के लिए आर्थिक मदद दी। एशिया, सेंट्रल एशिया और अफ्रीका में गरीब मरीजों के लिए फ्री मेडिकल कैंप चलाए। एशिया और यूरोप के विभिन्न अस्पतालों के डॉक्टरों और प्रोफेसरों के लिए फ्री ट्रेनिंग प्रोग्राम भी वित्तपोषित किया।
2016 में ब्रावो स्कॉलरशिप प्रोग्राम शुरू किया गया – ताशकंद की INHA यूनिवर्सिटी, एस्टोनिया की टैलिन टेक्निकल यूनिवर्सिटी, टार्टू यूनिवर्सिटी और मोतिहारी के महात्मा गांधी सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए।
बिहार और चंपारण से अटूट नाता
लंदन में रहते हुए भी उनका दिल चंपारण में ही बसता है। पुलवामा हमले में बिहार के शहीद संजय कुमार सिन्हा और रतन ठाकुर के परिवारों को 10-10 लाख की मदद भेजी और प्रयागराज कुंभ में 33 हजार दीप जलाकर शहीदों की आत्मा शांति के लिए प्रार्थना की।
दिव्यांग सेवा में उन्होंने ऐलान किया था कि चंपारण में 5000 दिव्यांगों को कृत्रिम हाथ, पैर और कैलीपर देंगे और एक भी दिव्यांग वंचित नहीं रहेगा। मोतिहारी के राजेंद्र छात्रावास में ई-लाइब्रेरी, सोलर पैनल और डॉ. अंबेडकर की प्रतिमा लगाने का काम भी फाउंडेशन ने हाथ में लिया ताकि गरीब छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर सकें।
सनातन संस्कृति के प्रणेता
धर्म और सनातन संस्कृति में उनकी गहरी आस्था है। भगवा वेशभूषा उनकी पहचान है। मोतिहारी के नरसिंह बाबा प्रांगण में भव्य परशुराम प्रतिमा का निर्माण करा रहे हैं।
हाल ही में उन्होंने ‘ब्रावो फाउंडेशन’ के बैनर तले ‘चंपारण-कश्मीर सद्भावना यात्रा’ निकाली। अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए बिना किसी राजनीतिक उद्देश्य के 100 युवाओं को कश्मीर के आध्यात्मिक धरोहरों के दर्शन कराए। उनका मानना है कि चंपारण अंग्रेजों के खिलाफ खड़े होने के लिए जाना जाता है और कश्मीर महर्षि कश्यप और मां शारदा की भूमि है – इन दोनों को जोड़ना ही सच्चा राष्ट्रवाद है।
सम्मान और पहचान
उज्बेकिस्तान सरकार ने उन्हें जीनोम के क्षेत्र में योगदान के लिए मानद प्रोफेसर की उपाधि दी। भारत के राजदूत मनीष प्रभात और उज्बेकिस्तान के स्वास्थ्य मंत्री की मौजूदगी में सम्मान मिला। ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में Excellence Award, Business Tycoon और Inspiring Social Activist 2019 से सम्मानित किया गया। केंद्र सरकार ने उन्हें प्रधानमंत्री जनकल्याणकारी योजना का बिहार ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किया।
राकेश पाण्डेय कहते हैं, “ईश्वर ने मुझे इतना सक्षम बना दिया है कि मेरी जानकारी में कोई लाचार भूखा न सोए।”
आज मोतिहारी के सरोत्तर गांव का वो लड़का जो कभी होटल में वेटर था, आज दुनिया को सस्ती और असरदार दवाएं दे रहा है, चंपारण में फैक्ट्री लगाकर रोजगार दे रहा है और युवाओं के लिए प्रेरणा बन गया है। यही है असली चंपारण के लाल की कहानी।











