संतोष राज पाण्डेय,पटना
बिहार में शिक्षा मंत्री बहुत आए, लेकिन शिक्षकों के दिल में जगह बहुत कम ही बना पाए। मिथिलेश तिवारी उसी कमी को पूरा करने वाले नाम बनते जा रहे हैं।
बिहार की शिक्षा व्यवस्था हमेशा से एक राजनीतिक अखाड़ा रही है। कभी कुर्सी-मेज के लिए मंत्री ने डीईओ को फटकारा, कभी ट्रांसफर-पोस्टिंग के नाम पर शिक्षकों को पटना दौड़ाया गया। लेकिन मई 2026 में जब बैकुंठपुर के विधायक मिथिलेश तिवारी ने सम्राट चौधरी सरकार में शिक्षा मंत्री का पद संभाला, तो लगा कि विभाग की भाषा बदल रही है। वे अधिकारी नहीं, शिक्षक को सेंटर में रखकर बात कर रहे हैं।
1. पहला फर्क: फरमान नहीं, पत्र से संवाद
मिथिलेश तिवारी ने सबसे पहला काम क्या किया? शिक्षक दिवस पर बिहार के 5 लाख 80 हजार शिक्षकों को एक व्यक्तिगत तीन पन्ने का पत्र लिखा।
पत्र में उन्होंने लिखा – “आप केवल ज्ञानदाता नहीं, राष्ट्र निर्माण के प्रथम शिल्पकार हैं।”
बिहार के इतिहास में शायद ही किसी शिक्षा मंत्री ने शिक्षकों को इस तरह संबोधित किया हो। इससे पहले शिक्षकों को आदेश मिलते थे – “इतने बजे आएंगे, ये पोर्टल भरेंगे, वरना सस्पेंड।” तिवारी ने कहा – “आपका सबसे महत्वपूर्ण कार्यस्थल आपका स्कूल है, आपको पटना प्रदर्शन करने की जरूरत नहीं।”
यही वजह है कि शिक्षक उन्हें अपना मंत्री मानते हैं, शासक नहीं।
2. दूसरा फर्क: छात्र के मनोबल का मंत्री
28 अगस्त 2026 को उन्होंने एक ऐतिहासिक ऐलान किया – अब बिहार में मैट्रिक-इंटर की मार्कशीट पर ‘फेल’ शब्द नहीं लिखा जाएगा।

उसकी जगह लिखा जाएगा – ‘कौशल विकास के लिए पात्र’। उन्होंने कहा – “किसी परीक्षा में अंक कम आना, बच्चे की प्रतिभा खत्म होने का प्रमाण नहीं है।”
सोचिए, जिस बिहार में फेल होने पर छात्र आत्महत्या तक कर लेते हैं, वहां एक शिक्षा मंत्री कह रहा है कि हम शब्द ही बदल देंगे। यह सिर्फ शब्द नहीं, सोच बदलने की राजनीति है। यह के.के. पाठक वाली डंडा वाली छवि से बिल्कुल उलट है।
3. तीसरा फर्क: BPSC आंदोलन को लाठी से नहीं, बातचीत से संभाला
अगस्त 2026 में जब 70वीं BPSC परीक्षा रद्द करने को लेकर हजारों छात्र गांधी मैदान से राजभवन तक मार्च कर रहे थे, पटना में बवाल मचा था।
पुलिस ने वाटर कैनन चलाया, लाठीचार्ज हुआ। लेकिन मिथिलेश तिवारी ने छात्रों को अपने आवास पर बुलाया, उनकी मांगें सुनीं और कहा – “सरकार ने छात्रों की मांगें मान ली हैं, बातचीत के दरवाजे हमेशा खुले हैं।”
उन्होंने BPSC को सिंगल एग्जाम फॉर्मेट के लिए समय देने का फैसला किया और कहा – “कोई इस प्रक्रिया में जल्दबाजी न करे, हमें पारदर्शी परीक्षा चाहिए।” यह वही समय था जब विपक्ष उन्हें घेर रहा था, लेकिन उन्होंने छात्रों पर राजनीति नहीं की।

4. चौथा फर्क: जमीन से जुड़ा विजन
मिथिलेश तिवारी एबीवीपी से निकले नेता हैं। 1988 में ABVP से जुड़े, 1990 में BJP ज्वाइन की, प्रदेश महामंत्री, उपाध्यक्ष, कई राज्यों के प्रभारी रहे। कोई राजनीतिक बैकग्राउंड नहीं, अपने दम पर पहचान बनाई। इसलिए उन्हें स्कूल की जमीन का दर्द पता है।
उन्होंने आदेश दिया कि बिहार के हर जिले में सरकारी स्कूलों की जमीन का लैंड रजिस्टर बनेगा, खाता-खेसरा दर्ज होगा ताकि कोई कब्जा न कर सके। उन्होंने कहा – “सरकारी विद्यालयों की जमीन सार्वजनिक संपत्ति है।”
इसके साथ ही उन्होंने 1520 भूमिहीन स्कूलों के लिए केंद्र से भवन बनाने की मदद मांगी, 3818 ICT लैब के लिए 91.63 करोड़ और 784 पुरानी लैब के लिए 18.82 करोड़ की मांग की। 525 स्कूलों में शौचालय मरम्मत, 836 स्कूलों में स्मार्ट बोर्ड की मांग भी रखी। ये फाइलों में नहीं, जमीन पर दिखने वाले काम हैं।
5. पांचवा फर्क: अपनी भाषा, अपनी पहचान
उन्होंने SCERT की बैठक में कहा – कक्षा 1 से 5 तक बच्चों को हिंदी के साथ भोजपुरी, मगही, मैथिली, अंगिका में पढ़ाया जाए।
और इसके लिए भोजपुरी, मगही, मैथिली, अंगिका के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाने का निर्देश दिया।
यह फैसला बताता है कि वे बिहार को नालंदा की विरासत से जोड़कर देख रहे हैं, जहां कभी देश-विदेश से छात्र पढ़ने आते थे।
6. शिक्षक क्यों करते हैं भरोसा?
क्योंकि उन्होंने “शिक्षक समाधान पोर्टल” लाने का वादा किया, जिसका लक्ष्य है 30 दिन में शिक्षकों की समस्या का समाधान। उन्होंने कहा – “अगर शिक्षक अपनी जिंदगी में परेशान है, तो वह पढ़ा नहीं सकता।”
उन्होंने TRE-4 में 32388 पदों के साथ मगही, मैथिली जैसी 8 भाषाओं के 886 नए पद जोड़ने की तैयारी शुरू की और अगले 5 साल में 1 लाख शिक्षकों की भर्ती का रोडमैप दिया, हर साल 20,000 भर्ती।
आज बिहार में 76,320 सरकारी स्कूल और 6.6 लाख शिक्षक हैं, लेकिन ट्रांसफर में उन्होंने मानवीय आधार – पति-पत्नी पोस्टिंग, स्वास्थ्य, परिवार को शामिल किया।
निष्कर्ष:
मिथिलेश तिवारी का नारा है – “Perform Through Reform”। वे परफॉर्म करने के लिए रिफॉर्म पर जोर दे रहे हैं।
बिहार ने शिक्षा में दो मॉडल देखे हैं – एक डंडे वाला, दूसरा दिखावे वाला। तिवारी तीसरा मॉडल दे रहे हैं – संवाद वाला।
वे 700 आदर्श विद्यालयों (सरस्वती विद्या निकेतन) के प्रिंसिपलों को 3 महीने में सुधार का टारगेट दे रहे हैं, लेकिन साथ में कह रहे हैं – “आप बदलाव के एजेंट हैं।”
यही वजह है कि आज बिहार का शिक्षक खुद को अकेला नहीं समझता। उसे लगता है कि पटना में कोई है जो उसकी चिट्ठी पढ़ता है, उसकी भाषा समझता है, और उसे फेल नहीं, राष्ट्र निर्माता कहता है।
और शायद इसी लिए मिथिलेश तिवारी सबसे अलग हैं।
संतोष राज पाण्डेय
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