संपादकीय – संतोष राज पाण्डेय
ललन सिंह और नीतीश कुमार की राहें फिर होंगी जुदा! 2010 वाला इतिहास दोहराएगा? निशांत कुमार की बढ़ती भूमिका से बदल रहा है सत्ता और संगठन का समीकरण

बिहार की राजनीति में फिर एक बार वही सवाल घूमने लगा है, जो 2010 में घूमा था।
क्या नीतीश कुमार और ललन सिंह की राहें फिर अलग होंगी?
ऊपर से देखने पर जदयू में सब ठीक लगता है। सरकार चल रही है, संगठन चल रहा है, नेता एक मंच पर दिख रहे हैं। लेकिन अंदरखाने जो खिचड़ी पक रही है, उसकी खुशबू अब पटना से दिल्ली तक पहुंचने लगी है।
निशांत कुमार – अब सिर्फ बेटा नहीं, उत्तराधिकारी
पहले निशांत कुमार का नाम सिर्फ नीतीश कुमार के बेटे के तौर पर लिया जाता था। आज वो स्वास्थ्य मंत्री हैं। कल को उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की चर्चा जोरों पर है।
यह चर्चा ऐसे ही नहीं है। यह संकेत है कि नीतीश कुमार अब धीरे-धीरे जदयू की विरासत को अपने परिवार के हाथ में सौंपने की तैयारी में हैं।
जब किसी पार्टी में उत्तराधिकारी तय होने लगता है, तो सबसे पहले पुराने शक्ति केंद्र हिलते हैं। और जदयू में इस वक्त सबसे बड़ा पुराना शक्ति केंद्र हैं – ललन सिंह।
विजय चौधरी और संजय झा – नई टीम तैयार?
दूसरी तरफ खबर है कि विजय कुमार चौधरी को संगठन की बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। संजय झा पहले से राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष हैं।
मतलब साफ है – नीतीश कुमार सरकार और संगठन, दोनों जगह अपनी नई टीम बना रहे हैं। एक तरफ निशांत, दूसरी तरफ विजय चौधरी और संजय झा।
अब सवाल ये है – इस नई टीम में ललन सिंह कहां फिट बैठेंगे?
ललन सिंह कभी नीतीश के सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार थे। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। आज केंद्र में मंत्री हैं। लेकिन बिहार की जदयू में उनकी पकड़ पहले जैसी नहीं दिख रही।
संजय झा Vs ललन सिंह – अंदरखाने शीतयुद्ध?
पार्टी के अंदर के लोग दबे जुबान कहते हैं – संजय झा और ललन सिंह के बीच सब कुछ ठीक नहीं है। बाहर से दोनों मुस्कुराते हैं, अंदर से दोनों एक-दूसरे की काट में लगे हैं।
पटना स्नातक MLC चुनाव ने इस आग में घी डाल दिया। नीरज कुमार जीते, लेकिन जीत के बाद उन्होंने खुलकर ललन सिंह पर निशाना साधा। अनंत सिंह वाले प्रकरण में ललन सिंह पर नरम रुख रखने का आरोप लगा।
नीरज की जीत ने एक बात साफ कर दी – जदयू में अब ललन सिंह का वो एकछत्र दबदबा नहीं रहा, जो कभी था।
2010 का इतिहास – जब गुरु-चेले की राहें अलग हुईं
जो लोग जदयू को करीब से जानते हैं, वो 2010 को भूले नहीं हैं।
2009 के लोकसभा चुनाव के बाद नीतीश और ललन में ठन गई। ललन ने नीतीश की कार्यशैली पर सवाल उठाए। बात इतनी बढ़ी कि 2010 में ललन सिंह को पार्टी से निलंबित कर दिया गया।
ललन सिंह कांग्रेस में चले गए। नीतीश अकेले रह गए।
फिर 2013 में सुलह हुई। ललन ने सार्वजनिक माफी मांगी और वापसी हुई। नीतीश ने फिर गले लगा लिया।
यानी 2010 में अलग हुए, 2013 में मिले। अब 2026 में फिर वही मोड़ आ गया है।
फर्क सिर्फ इतना है कि 2010 में लड़ाई नीतीश Vs ललन थी। 2026 में लड़ाई निशांत Vs पुराने नेताओं की होती दिख रही है।
MLC की हार ने खोल दी संगठन की पोल
जदयू ने 4 MLC सीटों पर चुनाव लड़ा, जीती सिर्फ 1 – पटना स्नातक। बाकी 3 पर हार।
5 नवंबर को हुई समीक्षा बैठक में यही चर्चा हुई – संगठन कमजोर क्यों है? बूथ पर काम क्यों नहीं हुआ? उम्मीदवार का चयन गलत क्यों हुआ?
प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा भले ही कह रहे हैं कि भाजपा से कोई दरार नहीं है, लेकिन अंदर ही अंदर सबको पता है कि जदयू का संगठन इस वक्त सबसे कमजोर दौर में है।
अब आगे क्या होगा?
तीन सवाल हैं, जिनका जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा:
1. क्या निशांत कुमार को सच में उपमुख्यमंत्री बनाया जाएगा?
2. क्या विजय चौधरी को संगठन सौंपकर संजय झा को और ऊपर ले जाया जाएगा?
3. और सबसे बड़ा – क्या ललन सिंह इस नए समीकरण में खुद को एडजस्ट करेंगे, या 2010 की तरह फिर अलग राह चुनेंगे?
ललन सिंह को हल्के में लेना भूल होगी। वो दिल्ली में मंत्री हैं, बिहार में उनका अपना जनाधार है। वो चुप हैं, इसका मतलब ये नहीं कि वो कमजोर हैं।
लेकिन राजनीति में एक सच है – जब उत्तराधिकारी आता है, तो पुराने सेनापति को या तो सेनापति बनकर रहना पड़ता है, या फिर मैदान छोड़ना पड़ता है।
नीतीश कुमार इस वक्त अपने बेटे के लिए रास्ता साफ कर रहे हैं। इस रास्ते में जो भी आएगा, उसे या तो हटना होगा, या झुकना होगा।
निष्कर्ष:
2010 में ललन सिंह ने नीतीश से टकराकर अपनी राजनीति अलग की थी, 2013 में झुककर वापसी की थी। 2026 में उनके सामने फिर वही दो रास्ते हैं – समझौता या टकराव।
बिहार की जनता सब देख रही है। जदयू का भविष्य अब इस बात पर टिका है कि नीतीश परिवार की विरासत को पार्टी पचा पाती है या नहीं।
अगर इतिहास दोहराया, तो बिहार में फिर एक बड़ा राजनीतिक भूकंप आएगा।
– संतोष राज पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार
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