निशांत कुमार का राजनीतिक दरवाजा को खटखटाना सबसे बड़ी मुसीबत बन कर बीजेपी के ऊपर गिरने वाली है

पटना

राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने निशांत के बहाने ऐसी चाल चल दी कि अब बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के परिणाम आने तक प्रदेश भाजपा की सांसे फूली की फूली रह जाएगी। राजनीतिक गलियारों में यह माना जा रहा है कि नीतीश कुमार ने निशांत कुमार को अपनी विरासत सौंप कर भाजपा को यह बात दिया कि टाइगर अभी स्वस्थ है और राज्य में बिछी राजनीतिक बिसात को लेकर यह पता है कि कब कौन सा मोहरा चल कर शह और मात की बाजी खेली जा सकती है।

निशांत से दी युवा राजनीति को आवाज?

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उस खास समय में निशांत कुमार को राजनीति के मैदान में उतारा जब जेपी आंदोलन से निकले नेता अपनी अंतिम पारी खेल रहे हैं और राज्य में युवा नेतृत्व के आगमन की धड़कन सुनाई देने लगी है। राजद जहां तेजस्वी, तेजप्रताप और मिसा भारती के सहारे युवा नेतृत्व को आगे कर रखा है तो लोजपा ने चिराग पासवान को। कांग्रेस ने कृष्णा और कन्हैया की जोड़ी को उतारा है। ऐसे में उस नीतीश कुमार ने, जिसे अस्वस्थ, थका हुआ, बोझ और भी न जाने क्या-क्या कहा गया, एक स्वस्थ बाजी खेल कर राजनीतिक जगत को एक विकल्प सामने रख दिया है।

कागजों में ही सही पर निशांत कुमार का यह विकल्प तमाम युवा नेतृत्व पर फिलहाल तो भारी है। निशांत कुमार राजनीति में आते हैं तो उनके पास इंजीनियरिंग की डिग्री है। समाज के लिए नौकरी छोड़ने का त्याग सामने आएगा। और साथ आएगा लव-कुश और विकास पसंद जनता का समर्थन। यह इसलिए भी निशांत की राजनीति को शूट करेगा कि आगामी चुनाव का फैसला वह वर्ग करेगा जिनकी उम्र 30 से 35 वर्ष के हैं और ये लगभग 58 प्रतिशत है।

नाउम्मीद भाजपा की राजनीति

दरअसल, निशांत कुमार का राजनीतिक दरवाजा को खटखटाना सबसे बड़ी मुसीबत बन कर बी जे पी के ऊपर गिरने वाली है। अभी तक तो प्रदेश भाजपा नीतीश कुमार की पालकी ढो रही थी, अब निशांत कुमार की पालकी ढोनी पड़े, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। वैसे भी 2025 का चुनाव नीतीश कुमार के लिए 2010 विधान सभा में प्राप्त सीटों का रिकॉर्ड तोड़ने का है। इस खास समय में नीतीश कुमार ने अपने बेटे निशांत कुमार को उतारकर अब तक जोड़े रखे अपने शांति और विकास पसंद वोटरों के लिए एक नया विकल्प सामने रख दिया। एक ऐसा चेहरा जो अब तक राजनीति से दूर रहा, अब अपने पिताजी के कमजोर कंधों पर सिर रखने आया है।

एनडीए की सियासत में जेडीयू का हाथ ऊपर

वैसे भी राज्य में एनडीए की राजनीति में जदयू का हाथ ऊपर रहा है। यही वजह है कि नीतीश कुमार और मुख्यमंत्री के पद के लिए विधायकों की संख्या कोई मायने नहीं रह सकता। भाजपा की जिस मजबूरी पर नीतीश कुमार का राजनीतिक महल खड़ा हुआ है वह आज भी है। प्रदेश भाजपा ने अनगिनत प्रयोग किए पर एक भी चेहरा सीएम फेस के लिए तैयार नहीं कर पाई। और भाजपा नीतीश का विकल्प अभी तक तैयार नहीं कर पाई।

तेजस्वी पर लगाया ब्रेक

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने निशांत कुमार को आगे कर तेजस्वी यादव के युवा नेतृत्व को एक चुनौती तो दे दी है। निशांत कुमार के साथ जंगल राज के विरुद्ध और विकास पसंद जनता के सामने नीतीश कुमार ने फिलहाल एक विकल्प रख दी। यह ऐसा विकल्प है, जिस पर विरासत की राजनीति के अलावा कोई आरोप नहीं लग सकता। निशांत के द्वारा युवा राजनीति को किस कदर आवाज देने की तैयारी है। आइये जानते हैं…

अंडर मैट्रिक नहीं, इंजीनियर हैं निशांत

नौकरी छोड़ राजनीति में आएंगे

भ्रष्टाचार या आपराधिक मुकदमा नहीं

चिंतन में आध्यात्मिक व्यक्तित्व

लव-कुश के साथ अमन, शांति और विकास पसंद जनता के समर्थ की उम्मीद

लिटमस टेस्ट होना बाकी

निशांत कुमार को आगे कर नीतीश कुमार ने एक तीर से कई निशाने साध लिए हैं। जदयू के अंतर्कलह को विराम दे दिया

भाजपा के सामने राजनीति की नई चुनौती दे डाली

पर यह सब वे बिंदु हैं जिसकी परीक्षा होनी है। नीतीश कुमार वाली औरा बना पाएंगे निशांत? बिहार की राजनीति में जिस तरह से महारथी कूट नीति का इस्तेमाल कर रहे हैं, वैसे में निशांत कब तक खुद को मजबूत रख पाएंगे। ऐसा इसलिए कि निशांत ने राजनीति को घृणा की दृष्टि से देखा या नहीं, पर पसंद तो अब तक नहीं किया। सवाल तो यह भी उठता है कि क्या नीतीश कुमार वाला प्यार लव-कुश वोटरों को यथावत मिलेगा? यह एक बड़ा सवाल है। और यह इसलिए भी कि इसी पर निशांत की राजनीति का भविष्य टिका है। और ये सारे ऐसे बिंदु हैं जिसका लिटमस टेस्ट होना बाकी है।

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