अगर किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो सारी कायनात तुम्हें उससे मिलाने की कोशिश में जुट जाती है

संतोष राज पांडेय

अगर किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो सारी कायनात तुम्हें उससे मिलाने की कोशिश में जुट जाती है” शाहरुख खान की फिल्म ‘ओम शांति ओम’ का ये डायलॉग फरहाना फारूक की जिंदगी की हकीकत है। शादी के बाद जब घर की माली हालत डगमगाने लगी तो मां से पैसे मांगने की बजाय फरहाना ने खुद पैसे कमाने का फैसला किया। गहने बेचकर पढ़ाई की और निकल पड़ी अपने परिवार, अपने बच्चों का भविष्य संवारने। लोअर मिडल क्लास फैमिली में पली-बढ़ी फरहाना फारूक कैसे बनीं फिल्म जर्नलिस्ट, आइए जानते हैं उनकी कहानी…

डर के साये में बीता मेरा बचपन

मेरा बचपन आम बच्चों की तरह नॉर्मल नहीं था। पापा सीवियर डिप्रेशन के शिकार थे इसलिए हम तीन भाई-बहनों की जिम्मेदारी अकेले मां के कंधों पर आ गई। मां टीचर थीं इसलिए पढ़ाई का महत्व अच्छी तरह जानती थीं। हम पढ़-लिखकर कुछ बन सकें इसलिए हमें कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाया गया। मैं पढ़ाई में बहुत अच्छी थी, लेकिन घर के माहौल ने मुझे अंतर्मुखी बना दिया।

डिप्रेशन के कारण पापा का व्यवहार हमेशा बदलता रहता। जब उन्हें गुस्से का दौरा पड़ता तो घर का पूरा माहौल बिगड़ जाता। हमारी आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी। ये सब देखकर मैं बुरी तरह सहम जाती। घर के माहौल पर से ध्यान हटाने के लिए मैं पढ़ाई में जुट जाती। इसका फायदा ये हुआ कि स्कूल के बाद मेरा एडमिशन सेंट जेवियर्स कॉलेज में हो गया। कॉलेज में मुझे बहुत अच्छा माहौल मिला, जिसके कारण मेरा डर कम होने लगा। मेरा अंतर्मुखी व्यवहार भी बदलने लगा। अब मैं बदलने लगी थी। लेकिन मैं कुछ बन पाती इससे पहले मेरी शादी कर दी गई।

शादी के बाद जिंदगी बदल गई

मां नहीं चाहती थी कि हम दोनों बहनों को शादी के बाद भी गरीबी के साये में रहना पड़े। उन्होंने अच्छा रिश्ता मिलते ही हमारी शादी कर दी। मेरी शादी 20 साल में हो गई थी। इस कारण मैं कुछ बन नहीं पाई।

संपन्न परिवार में शादी होने के कारण मेरी जिंदगी बदल गई। गरीबी पीछे छूट गई। आए दिन नए नए कपड़े, गहने खरीदना जैसे आदत में शुमार हो गया। मेरे लिए ये सब किसी सपने जैसा था। ऐसा खुशहाल ससुराल पाकर मैं बहुत खुश थी। अब जिंदगी से कोई शिकायत नहीं थी। 24 साल में मैं दो बच्चों की मां बन चुकी थी।

आर्थिक तंगी ने बनाया आत्मनिर्भर

सबकुछ अच्छा चल रहा था कि धीरे धीरे हमारे बांधनी फैब्रिक के बिजनेस में नुकसान होने लगा। इसका असर हमारे संयुक्त परिवार पर भी पड़ा। परिवार बिखरने लगा। पति को बिजनेस में इतना नुकसान हुआ कि घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया। दोनों बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी भारी पड़ने लगा था। इस तकलीफ के समय मेरी मां ने बहुत मदद की। मां हर महीने अपनी पेंशन में से कुछ पैसे मुझे घर चलाने के लिए देती थी। लेकिन मुझे मां से पैसे लेना अच्छा नहीं लगता था। मां ने इतनी तकलीफ उठाकर हमें बड़ा किया। शादी के बाद उनसे पैसे लेना मुझे बहुत तकलीफ देता। फिर मैंने फैसला किया कि अब मैं आत्मनिर्भर बनूँगी और खुद पैसे कमाऊँगी।

40 की उम्र में की करियर की शुरुआत

मैं काम तो करणा चाहती थी, लेकिन ये नहीं जानती थी कि मुझे करना क्या है। एक दिन मैंने जर्नलिज्म के कोर्स के बारे में पढ़ा। लेकिन मेरे पास जर्नलिज्म के कोर्स की फीस के पैसे नहीं थे। मैंने अपने गहने बेचे और एडमिशन ले लिया। घरवालों को मेरा ऐसा करना अच्छा नहीं लगा। लेकिन मेरे पास और कोई विकल्प नहीं था। मुझे लिखना अच्छा लगता था। पापा कविताएं लिखते थी, शायद लिखने का हुनर मुझे उन्हीं से मिला। ये वो समय था जब मैं और मेरे बच्चे एक साथ पढ़ रहे थे।

पहली जॉब में मुझे बॉलीवुड पर लिखने का मौका मिला। ये मेरा पसंदीदा विषय था। बचपन से फिल्म देखने का शौक था इसलिए इस विषय पर दिल से लिखा। मेरा काम नजर आने लगा। फिर कभी पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ी। मैंने देश की कई बड़ी फिल्म मैगजीन के लिए काम किया। रिटायरमेंट के बाद भी मेरा लिखना जारी है। करियर ने मेरे घर की आर्थिक स्थिति बदली और मुझे एक नई पहचान दी।

पति के जाने के बाद करियर ने साथ दिया

अगर मैं सही समय पर काम करने का फैसला न करती तो मेरे बच्चों का भविष्य अधर में रह जाता। मेरा करियर शुरू होते ही पति हमें छोड़कर चले गए। दोनों बच्चों की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई। इस्लाम में विधवा महिला साढ़े चार महीने तक घर से नहीं निकलती। लेकिन पति के जाने के बाद मैंने 10वें दिन से काम करना शुरू कर दिया। मुझे पैसों की जरूरत थी। अपने बच्चों के लिए मैंने घर में रहने की बजाय ऑफिस जाने का फैसला किया। इसके अलावा मेरे पास और कोई विकल्प नहीं था।

मेरा मानना है कि महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहिए। बुरे वक्त में यही आत्मनिर्भरता उनकी ताकत बन जाती है। अगर महिला कमाती है तो परिवार का उनके प्रति व्यवहार बदल जाता है। मेरे कठिन समय में करियर ने मेरा साथ दिया। मेरे पास काम था इसलिए बच्चों की पढ़ाई और घर के खर्च में कोई रुकावट नहीं आई।

थावे सिंहासिनी माई

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