आध्यात्मिक गुरु पंडित कमला पति त्रिपाठी
🌟🌻🌼🌻⭐नवरात्र के पहले दिन 22 सितंबर को मां शैलपुत्री की पूजा का महत्व जीवन में स्थिरता, शांति और समृद्धि लाना है, क्योंकि वे नवदुर्गा का प्रथम स्वरूप हैं और पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। उन्हें गाय के घी से बनी खीर का भोग अत्यंत प्रिय है, साथ ही सफेद मिष्ठान जैसे रसगुल्ला या मलाई बर्फी भी अर्पित कर सकते हैं, जिससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

मां शैलपुत्री के पूजन का महत्व:
स्थिरता और शक्ति: मां शैलपुत्री पर्वत के समान दृढ़ और अडिग मानी जाती हैं, इसलिए उनकी पूजा से जीवन में स्थिरता और तपस्या का गुण आता है।
सुख-समृद्धि: इस दिन पूजा करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है और धन-धान्य की कमी नहीं होती।
सकारात्मकता: मां को शुद्ध और सात्विक भोग चढ़ाने से वातावरण में सकारात्मकता आती है।
सुयोग्य वर की प्राप्ति: कुंवारी कन्याओं को मां शैलपुत्री की पूजा करने से सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है।
भोग की सामग्री:
गाय के घी से बनी खीर: गाय के दूध से बनी खीर, जिसमें चीनी, इलायची, साबूदाना या मखाना डाला जाता है, मां शैलपुत्री को बहुत प्रिय है।
सफेद मिष्ठान: आप गाय के शुद्ध घी से बनी सफेद मिठाई जैसे रसगुल्ला, मलाई बर्फी या मिश्री का भी भोग लगा सकते हैं।
अन्य सामग्री: भोग के लिए गाय के घी का इस्तेमाल करें।
अन्य महत्वपूर्ण बातें:
पुष्प और वस्त्र: मां को सफेद फूल और सफेद वस्त्र अर्पित करना शुभ माना जाता है।
पूजा विधि: पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें, मां की प्रतिमा स्थापित करें, कलश स्थापना करें, और फिर धूप-दीप दिखाकर आरती करें।
प्रसाद ग्रहण करें: पूजा के बाद अर्पित भोग को परिवार के सदस्यों के साथ प्रसाद के रूप में ग्रहण करें।🌟 🌻🌼🌻🌟 🌟🌻🌼🌻🌟










