रिव्यू का युग: जब सत्य एल्गोरिदम में और विवेक स्क्रोल में खो गया :✒️डॉ. निरंजन कुमार

डॉ. निरंजन कुमार


यह प्रश्न केवल चिंता नहीं, चेतावनी है—दुनिया कहाँ जा रही है और आज की पीढ़ी कहाँ खड़ी है?
समय भी परेशान है, चारों तरह रिव्यू का दुकान है।
आज का समय “अनुभव” का नहीं, “रिव्यू” का समय है। सच और झूठ, अच्छा और बुरा, गुणवत्ता और धोखा—सब कुछ अब स्क्रीन पर लिखी कुछ पंक्तियों और सितारों की गिनती से तय होने लगा है।
झूठ और सच भी अब रिव्यू तय कर्ता है।
कभी लोग आँखों से देखते थे, कानों से सुनते थे और दिमाग से समझते थे। आज लोग स्क्रीन से मानते हैं।
सब्ज़ी खरीदनी हो, होटल चुनना हो, डॉक्टर के पास जाना हो या बच्चों का भविष्य तय करने वाला मेडिकल कॉलेज—पहला सवाल अब यह नहीं होता कि “वहाँ जाओ और देखो”, बल्कि यह होता है कि “उसका रिव्यू कितना है?”
विडंबना देखिए—आज AIIMS जैसे संस्थान का रिव्यू किसी औसत निजी कॉलेज से कम मिल सकता है। तो क्या AIIMS सच में खराब है? या फिर रिव्यू की दुकान में सच्चाई बिक नहीं पाती?
रिव्यू बनाम वास्तविकता :
रिव्यू का मूल उद्देश्य मार्गदर्शन था, लेकिन आज वह व्यवसाय बन चुका है।
फर्जी अकाउंट, पेड प्रमोशन, एजेंडा आधारित वीडियो—इन सबने रिव्यू को सूचना नहीं, हथियार बना दिया है।
अब किसी संस्थान को रातों-रात “हीरो” बनाया जा सकता है और किसी प्रतिष्ठित जगह को “ज़ीरो”।
खतरा यहाँ नहीं कि लोग रिव्यू देखते हैं—
खतरा यह है कि लोग रिव्यू के अलावा कुछ देखते ही नहीं।
रिव्यू ही आपका भविष्य तय करने वाला बन गया है,जिसका खुद का ही भविष्य नहीं है।
रिव्यू के बाजार में सबकुछ बिकता है क्वालिटी देख कर नहीं रिव्यू देख कर।
YouTuber संस्कृति और भ्रम का बाज़ार
आज हज़ारों ऐसे YouTuber हैं जो कभी विदेश गए नहीं, लेकिन विदेशों पर ज्ञान बाँट रहे हैं। ठीक उसी तरह जैसे किसी ने अपना नाखुन का आप्रेशन नहीं कराया हो और दूसरे को बाइपास सर्जरी कराने का सलाह देता है।
जो कभी नेपाल नहीं पहुँचे, वे नेपाल के मेडिकल कॉलेजों पर “एक्सपर्ट” बनकर वीडियो बना रहे हैं। कोई कोई तो अपने को नेपाल के मेडिकल कालेज का faculty भी बताते हैं और काम क्या करते भ्रम फैला कर बच्चों को गुमराह करते है।
सब्सक्राइबर बढ़ाने के लिए सनसनी, आधी-अधूरी जानकारी और कई बार पूरी तरह झूठ।
नेपाल के मेडिकल एडमिशन में हाल के वर्षों में इसका खतरनाक उदाहरण देखने को मिला।
भारत से आए कई छात्र—जिन्होंने न नेपाल देखा था, न वहाँ की व्यवस्था समझी थी—सिर्फ YouTube वीडियो देखकर MEC काउंसलिंग तक पहुँच गए।
YouTuber ने उनसे 20–25 हज़ार रुपये लिए और उन्हें स्थानीय एजेंटों के हवाले कर दिया।
यहीं से शुरू हुआ आर्थिक दोहन, भ्रम और पछतावे का सिलसिला।
यह ज्ञान नहीं था—यह एक सुनियोजित लूट थी।
अब जो कमिशन मिलेगा उसे दोनों मिल बांट कर आपस में खाएंगे।
स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि यदि मेडिकल कॉलेज के प्रबंधन का आदमी भी सच बताये तो ये जो युवा पीढ़ी है उसे झूठ समझेंगे और कहेंगे कि यू tuber ने जो कहा है वही सच है आप के माथे पर इस कदर इस यू tuber ने जगह बना लिया है। अब आप चाह कर भी उस से बाहर नहीं आ सकते। झूठ हर वक़्त खूबसूरत दिखता है ,और सच कडवा।
आँख बंद भरोसा: नई पीढ़ी की सबसे बड़ी कमजोरी
पहले माता-पिता और बच्चे कॉलेज जाकर देखते थे, छात्रों से मिलते थे, माहौल समझते थे। हॉस्टल देखते थे मेस देखते थे।
आज बच्चे घर बैठे वीडियो देखकर माता-पिता को “समझा” देते हैं।
अनुभव की जगह एल्गोरिदम ने ले ली है।
यह दौर ऐसा है कि लोग फोन करके भी बात नहीं करते—बस रिव्यू पढ़ते हैं और निर्णय ले लेते हैं।
मान लेते हैं कि हर लिखा सच है, हर वीडियो निष्पक्ष है।
यहीं सबसे बड़ा धोखा है।
क्या यह लूट का नया तरीका नहीं?
नकली रिव्यू, पेड वीडियो, फर्जी प्रशंसा—
यह सब मिलकर एक नया उद्योग बन चुका है, जहाँ सबसे ज्यादा नुकसान छात्रों और मध्यमवर्गीय परिवारों को होता है।
समय जाता है, पैसा जाता है और अंत में विश्वास भी।
आज मंदिरों के भी रिव्यू देखे जाने लगे हैं।
कल क्या होगा?
क्या आने वाली पीढ़ी माँ-बाप का भी रिव्यू देखकर तय करेगी कि उनकी बात माननी है या नहीं?
यह एक यक्ष प्रश्न है? आखिर हमारा समाज कहाँ जा रहा है ? हमारा आने वाला जेनरेशन कैसा होगा? क्या हमारे ज्ञान को भी रिव्यू तय करेगा?

उपचार क्या है?:-
इस अंधे दौर का इलाज तकनीक से नहीं, विवेक से होगा।
रिव्यू को सूचना मानिए, निर्णय नहीं
एक वीडियो नहीं, कई स्रोत देखिए
ज़मीनी हकीकत जानने के लिए प्रत्यक्ष संवाद ज़रूरी है
संस्थानों की साख वर्षों में बनती है, वीडियो में नहीं । आपके बच्चे अभी उतने भी परिपक्व नहीं हुए हैं आप अपनी जिम्मेदारी को समझने का प्रयास करे। पुरानी कहावत है कि बहुत कुछ उम्र से आता है।
सरकार और नियामक संस्थाओं को भी फर्जी डिजिटल गाइडेंस पर सख्ती करनी होगी
निष्कर्ष
यह युग रिव्यू का है, इसमें इंकार नहीं। किस तरह रिव्यू तैयार होता है कैसे बनता है यह भी जानना चाहिए।
लेकिन अगर रिव्यू ही सब कुछ बन गया, तो सोचिए—मानव विवेक कहाँ जाएगा?
आज जरूरत है आँख खोलकर देखने की, सवाल पूछने की और हर चमकती स्क्रीन पर लिखे शब्दों पर भरोसा न करने की।
क्योंकि अगर सत्य को हमने एल्गोरिदम के हवाले कर दिया,
तो आने वाली पीढ़ी शायद यह भी पूछेगी—
“सच का रिव्यू कितना है?”
और यही इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी होगी।
हर चमकने वाला पत्थर हीरा नहीं होता है और हर चमकने वाला धातु सोना भी नहीं।
बस एक छोटा सा प्रयास करना है हो सकता है किसी का घर उजड़ने से बच जाए।

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