इस वर्ष मकर संक्रांति का पुनीत पर्व 15 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा

आध्यात्मिक गुरु पंडित कमला पति त्रिपाठी

इस वर्ष मकर संक्रांति का पुनीत पर्व 15 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा। 14 जनवरी के रात्रि 9.19 मिनट पर मकर के सूर्य ( उत्तरायण ) का आगमन होगा । 14 को षष्ट तिला एकादशी है और एकादशी को चावल और तिल प्रयोग वर्जित है अतः 15 को मकर संक्रान्ति फलदायी होगा।

मकर संक्रांति को लेकर जिले के प्रमुख आध्यात्मिक गुरु, आचार्य पुरोहितों ने आपसी बातचीत कर कहा कि 15 तारीख को मकर संक्रांति फलदाई है। इसकी जानकारी देते हुए आध्यात्मिक गुरु पंडित कमलापति त्रिपाठी ने बताया कि मकर संक्रांति को लेकर समस्त विद्वानों की सहमति है। बताया कि गरीबनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी पं विनय पाठक, प्रमुख आचार्य पं सुनेता तिवारी, पं नथुनी तिवारी, पं ब्रजेंद्र ओझा,पं धीरज झा धर्मेश,पं अभिनय, पाठक पं प्रभात मिश्रा,आर्ष विद्यापीठ, पं सुशील पांडेय,‌पं मदन मोहन शास्त्री,पं अभिनव पाठक,पं दिवाकर उपाध्याय, पं जयकिशोर मिश्र, पं धर्मेंद्र तिवारी, पं सुनील पांडेय, पं सुनील मिश्र, पं संतोष मिश्र , पं जयशंकर तिवारी, पं संजय तिवारी, पं हरिशंकर पाठक,पं विनोद कुमार मिश्र, पं संजय कुमार मिश्र, पं सुमन पाण्डेय,पं शत्रुघ्न ओझा आदि ने अपनी सहमति दी है।


मकर संक्रान्ति जिस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और सूर्य उत्तरायण होते हैं। मकर संक्रान्ति (मकर संक्रांति) भारत के प्रमुख पर्वों में से एक है। मकर संक्रांति (संक्रान्ति) पूरे भारत और नेपाल में भिन्न रूपों में मनाया जाता है। पौष मास में जिस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है उस दिन इस पर्व को मनाया जाता है। वर्तमान शताब्दी में यह त्योहार जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है, इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है। तमिलनाडु में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप में जाना जाता हैं जबकि कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं। बिहार के कुछ जिलों में यह पर्व तिला संक्रांत नाम से भी प्रसिद्ध है। मकर संक्रान्ति पर्व को कहीं-कहीं उत्तरायण भी कहते हैं। 14 जनवरी के बाद से सूर्य उत्तर दिशा की ओर अग्रसर (जाता हुआ) होता है। इसी कारण इस पर्व को ‘उतरायण’ (सूर्य उत्तर की ओर) भी कहते है। वैज्ञानिक तौर पर इसका मुख्य कारण पृथ्वी का निरंतर 6 महीनों के समय अवधि के उपरांत उत्तर से दक्षिण की ओर वलन कर लेना होता है। और यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश, भीष्म पितामह द्वारा प्राण त्याग, भगवान विष्णु की असुरों पर विजय और गंगा के सागर से मिलन से जुड़ा है, जो अंधकार से प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है; इस दिन उत्तरायण शुरू होता है, जो मोक्षदायक माना जाता है, और दान-स्नान का विशेष पुण्य होता है, जिससे शुभ कार्यों की शुरुआत होती है, जैसे विवाह, यज्ञ ,गृहप्रवेश ,गृहारंभ आदि शुभ कार्य और खरमास की समाप्ति के साथ हो जाते है।
मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनिदेव से मिलने उनके घर (मकर राशि) जाते हैं, जो पिता-पुत्र के प्रेम और सद्भाव का प्रतीक है।


एक कथा के अनुसार, शनि देव के पास तिल के अलावा कुछ नहीं था, तो उन्होंने तिल से सूर्य पूजा की, जिससे प्रसन्न होकर सूर्य ने उन्हें आशीर्वाद दिया, और तभी से तिल का महत्व बढ़ा।
महाभारत के अनुसार, भीष्म पितामह ने बाणों की शैया पर रहते हुए अपने प्राण त्यागने के लिए मकर संक्रांति (उत्तरायण) का इंतजार किया, क्योंकि इस अवधि में देह त्यागने से मोक्ष मिलता है।
विष्णु पुराण के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने असुरों का संहार कर उनके सिर मंदार पर्वत पर गाड़ दिए थे, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
पौराणिक कथा है कि मकर संक्रांति पर ही गंगा नदी भगीरथ के पीछे कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में मिली थी, जिससे भगीरथ के पूर्वजों को मुक्ति मिली।
देवताओं का दिन (उत्तरायण):
मकर संक्रांति से देवताओं का दिन शुरू होता है (जो खर मास के बाद आता है), और यह समय शुभ कार्यों, दान और तपस्या के लिए बहुत फलदायी माना जाता है, जिससे सकारात्मकता बढ़ती है।
दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश करता है, जो अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा का प्रतीक है।
शुभ कार्यों का आरंभ: खर मास की समाप्ति के बाद विवाह, मुंडन, जनेऊ जैसे शुभ और मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है।
पवित्र नदियों में स्नान और दान हरिद्वार, प्रयाग, काशी जैसे पवित्र स्थानों पर नदियों में स्नान और तिल, गुड़, खिचड़ी आदि का दान करने से विशेष पुण्य मिलता है।
दक्षिणायन को नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है।
मकर सं देवताओं के दिन की शुरुआत: हमारी पृथ्वी एक वर्ष में सूर्य का एक चक्कर लगाती है, जिसे ‘एक सौर वर्ष’ कहते हैं । मकर संक्रांति काफी महत्व है. इस दिन सूर्य देव उत्तरायण होते हैं ।मकर संक्रांति भगवान सूर्य के अपने पुत्र शनिदेव से मिलने का उत्सव है, जो मेल-मिलाप और पारिवारिक सद्भाव का प्रतीक है।

( लेखक आध्यात्मिक गुरु पंडित कमला पति त्रिपाठी प्रमोद
श्री लक्ष्मेश्वर वैद्यनाथ महादेव मंदिर अखाड़ा घाट मुजफ्फरपुर बिहार के संस्थापक भी है )

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