खामोश दुनिया, बेखौफ अमेरिका…. न्याय का हनन और ‘सुपरपावर’ की मनमानी है वेनेजुएला संकट

वेनेजुएला और विश्व व्यवस्था का खतरनाक क्षरण

— डॉ. निरंजन कुमार


वेनेजुएला आज केवल एक लैटिन अमेरिकी देश नहीं, बल्कि उस वैश्विक संकट का प्रतीक बन गया है जिसमें अंतरराष्ट्रीय नियम, संप्रभुता और कूटनीति लगातार कमजोर होती जा रही हैं। यदि किसी संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति Nicolás Maduro को उसकी पत्नी सहित आधी रात में एक विदेशी शक्ति द्वारा हिरासत में ले जाने जैसी घटनाओं की चर्चा सामने आती है और विश्व समुदाय केवल औपचारिक “चिंता” व्यक्त कर मौन साध लेता है, तो यह किसी एक देश की समस्या नहीं रह जाती। यह विश्व व्यवस्था के नैतिक क्षरण का संकेत है।

जिस तरह से राष्ट्रपति Nicolás Maduro को पत्नी सहित अपहरण करके न्यूयार्क ले जाया गया ये विश्व इतिहास में अपने तरह की पहली घटना है। जब देश का राष्ट्रपति अपने घर में सुरक्षित नहीं है तो फिर कौन? ये अमेरिका की दादागिरी नहीं है तो क्या है?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय प्रणाली इस सिद्धांत पर आधारित थी कि कोई भी देश, चाहे वह कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, किसी अन्य राष्ट्र की संप्रभुता को बलपूर्वक कुचल नहीं सकता। जब यह सिद्धांत कमजोर पड़ता है, तो अराजकता तुरंत नहीं फैलती, बल्कि धीरे-धीरे दबाव और डर को सामान्य व्यवहार के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है। यही आज की सबसे बड़ी चिंता है।
वेनेजुएला के संदर्भ में यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या वहाँ लोकतंत्र पूरी तरह सशक्त है। यह आलोचना आंशिक रूप से सही हो सकती है। परंतु इतिहास बताता है कि दुनिया में कई ऐसे देश हैं जहाँ लोकतांत्रिक कमियाँ होने के बावजूद बाहरी हस्तक्षेप नहीं किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि वेनेजुएला का वास्तविक “अपराध” कुछ और है—उसके पास विशाल तेल संसाधन हैं, उसने डॉलर-आधारित वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को चुनौती देने की कोशिश की और उसने अमेरिकी भू-राजनीतिक वर्चस्व को बिना शर्त स्वीकार करने से इंकार किया।
Donald Trump के दौर में अमेरिकी विदेश नीति में यह प्रवृत्ति और स्पष्ट हुई। बहुपक्षीय कूटनीति और संवाद के स्थान पर व्यक्तिगत दंभ, दबाव और लेन-देन आधारित राजनीति को प्राथमिकता दी गई। Trump की भाषा और निर्णय-शैली यह संकेत देती है कि वे अंतरराष्ट्रीय संबंधों को समान राष्ट्रों के बीच संवाद के रूप में नहीं, बल्कि अधीनता और नियंत्रण के रूप में देखते हैं। ऐसी प्रवृत्ति वैश्विक नेतृत्व की परिपक्वता नहीं, बल्कि एक प्रकार की राजनीतिक असंतुलन को दर्शाती है, जहाँ शक्ति को ही नैतिकता मान लिया जाता है।
इतिहास इस संदर्भ में एक स्पष्ट चेतावनी देता है। Adolf Hitler ने भी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और समझौतों को महत्वहीन समझते हुए भय और शक्ति के बल पर अपने निर्णय थोपे थे। यह तुलना तरीकों की नहीं, बल्कि मानसिकता की है—वह मानसिकता जो यह मान लेती है कि ताक़त ही सत्य है। इतिहास गवाह है कि ऐसी सोच अंततः विनाश की ओर ही ले जाती है।
वेनेजुएला कोई अपवाद नहीं है। इराक़ में झूठे हथियारों के आरोपों के आधार पर Saddam Hussein को फाँसी दी गई और पूरा क्षेत्र आज तक अस्थिर है। लीबिया में “लोकतंत्र” के नाम पर हस्तक्षेप के बाद Muammar Gaddafi की निर्मम हत्या हुई और देश एक विफल राज्य बन गया। बांग्लादेश में लंबे समय तक चले बाहरी दबावों और आंतरिक अस्थिरता के बीच Sheikh Hasina को देश छोड़ना पड़ा। हर जगह परिणाम एक-सा रहा—राजनीतिक शून्य, सामाजिक अस्थिरता और दीर्घकालिक संकट।
इन घटनाओं में खुफ़िया एजेंसियों की भूमिका पर भी वर्षों से सवाल उठते रहे हैं। Central Intelligence Agency के हस्तक्षेप के ऐतिहासिक प्रमाण लैटिन अमेरिका से लेकर एशिया तक उपलब्ध हैं। आज अंतर केवल इतना है कि यह हस्तक्षेप पहले से अधिक निर्भीक और कम छिपा हुआ दिखाई देता है।
भारत और दक्षिण एशिया के लिए भी इससे महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं। भारत का बढ़ता आर्थिक आत्मविश्वास और रणनीतिक स्वतंत्रता वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित कर रही है। ये अमेरिका के आँखों में चुभ रहा है । भारत के प्रधान मंत्री मोदी जी के बढ़ते कद से भी ट्रम्प परेसान है। भारत के पड़ोसी देशों में अस्थिरता ला कर भारत को अस्थिर करने का प्रयास किया जा रहा है।
दक्षिण एशिया में बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता—चाहे वह बांग्लादेश हो या नेपाल—को केवल आंतरिक घटनाओं के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। आधुनिक हस्तक्षेप अब सीधे युद्ध के माध्यम से नहीं, बल्कि आर्थिक दबाव, सूचना-युद्ध और सामाजिक ध्रुवीकरण के ज़रिये किया जाता है।
शेख हसीना के बाद जिस तरह से एक कठपुतली सरकार बांग्लादेश में यूनुस के रूप में अमेरिका ने बैठा दिया है वह किसी से भी छुपा नहीं है।
कुछ इसी तरह का खेल सीआईए नेपाल में भी खेल रहा है।
लोकतांत्रिक देशों को अस्थिर करना ट्रम्प प्रशासन का मुख्य उद्देश्य बन गया है। रूस और चीन खामोश है ।
इन सबके बीच United Nations की भूमिका पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। यदि ऐसे मामलों में संयुक्त राष्ट्र केवल औपचारिक बयान तक सीमित रह जाए, तो उसकी विश्वसनीयता स्वाभाविक रूप से घटती है। अंतरराष्ट्रीय क़ानून यदि केवल कमजोर देशों पर लागू हो, तो संस्थाएँ केवल प्रतीक बनकर रह जाती हैं।
वेनेजुएला के माध्यम से दुनिया को जो संदेश दिया जा रहा है, वह स्पष्ट और खतरनाक है—अनुपालन करो, अन्यथा परिणाम भुगतो। यह संदेश लोकतंत्र की रक्षा नहीं करता, बल्कि उसे कमजोर करता है। यह लेख किसी एक देश के विरुद्ध नहीं, बल्कि बेलगाम और जवाबदेही-रहित शक्ति के विरुद्ध एक चेतावनी है। यदि आज विश्व समुदाय चुप रहा, तो कल यही चुप्पी स्वयं उसके लिए संकट बन सकती है। इतिहास चुप्पी को कभी माफ़ नहीं करता।

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