संतोष राज पाण्डेय
आज ब्रिटेन ही नहीं, भारत के अखबारों के पन्ने भी ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के महिमा मंडन भे पटे हुए हैं। उनके चेहरे की आभा हम शायद ही भूल पाएं। ग्रेट ब्रिटेन समेत पूरी दुनिया के लिए उनके योगदान का बखान हो रहा है। किंग चार्ल्स तृतीय के राजा घोषित होने पर उनके स्वभाव, तुनुकमिजाजी, पसंद व जीवनशैली के कसीदे पढ़े जा रहे हैं। हम यह पढ़कर गदगद हैं कि किंग चार्ल्स तृतीय के जुते के फीते पर भी इस्त्री की जाती है। जिस ब्रिटिश राजवंश ने सैकड़ों वर्षों तक हिन्दुस्तान पर क्रूरता से हुकूमत किया, उसके यशगान में भारतीय मीडिया में श्रद्धा व कृतज्ञता का आवेग फूट पड़ा है। क्या ऐसे समय में हमें अपने उन राजे रजवाड़ों को भी याद नहीं करना चाहिए, जिन्होंने समाज और देश के लिए बहुमूल्य योगदान दिया। शिक्षा का अलख जगाने के लिए सैकड़ों स्कूल-काॅलेजों की स्थापना की। पीड़ित मानवता की सेवा के लिए अस्पताल बनाए। जिन्होंने देश और खासकर बिहार की तरक्की के लिए, रोजी रोजगार पैदा करने के लिए उद्योगों की स्थापना की। जब राजशाही के विघटन की नौबत आयी तो वंशजों की बराबरी में आमजन को भी हिस्सेदारी दी। हमारी मीडिया उनके प्रति कृतघ्न क्यों है? पटना विवि, लंगट सिंह काॅलेज, बीएचयू, कलकत्ता विवि, इलाहाबाद विवि, कामेश्वर सिंह संस्कृत विवि, दरभंगा मेडिकल कॉलेज, एलएन मिथिला विवि एवं अलीगढ़ मुस्लिम विवि की स्थापना में सर्वस्व न्यौछावर करने वाले दरभंगा राज, हथुआ महाराज एवं धरहारा स्टेट जैसे राजे रजवाड़े एवं स्टेट को आज का बिहार वह सम्मान नहीं दे रहा है, जिसका वे हकदार थे। इनके ऐतिहासिक योगदान पर हमारी आगामी पीढ़ियां फक्र करते हुए कह सकती हैं कि हमारे रजवाड़े ने भी मानवता के उत्थान के लिए बहुत कुछ किया।
क्या देश के सभी राजे रजवाड़े वास्तव में क्रूर, शोषक, बेइमान और जुल्मी होते थे? क्या उनमें मानवता, करुणा, दया और समाज सेवा की भावना नहीं थी? क्या वे हकीकत में वैसे ही थे, जैसी नकारात्मक छवि हिन्दी फिल्मों में गढ़ी जाती है? क्या वे सामाजिक – शैक्षणिक विकास, व्यावसायिक व औद्योगिक प्रगति, आम लोगों की रोजी -रोटी, स्वास्थ्य व परिवहन सेवाओं के प्रति गैरजिम्मेदार थे? दरभंगा के महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह के निधन के 60 साल (1 अक्टूबर 2022) पूरे होने पर उनके शैक्षणिक- आर्थिक योगदान, समाज कल्याण का मूल्यांकन करें तो हमारे तथाकथित लोकतांत्रिक राजनेता कठघरे में खड़े नजर आते हैं। सवाल उठता है कि आखिर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह और बाद के कई शासकों ने उन राजे रजवाड़ों को उखाड़ फेंकने, उजाड़ने में पूरी ताकत क्यों झोंक दी, जिनकी लोकतंत्र में आस्था थी ?


आजादी के बाद शासक वर्ग के लिए एक पक्षीय इतिहास लिखने वालों ने प्रचारित किया कि राजे रजवाड़े अंग्रेजी हुकूमत के पिट्ठू थे। सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस पार्टी अंग्रेजों के तलवे नहीं सहला रही थी? प्रथम विश्व युद्ध में कुल 8 लाख भारतीय सैनिकों ने हिस्सा लिया, जिसमें करीब 47746 सैनिक मारे गये और 65000 घायल हुए। कांग्रेस इस लड़ाई में शामिल होने को लेकर ब्रिटेन को समर्थन दे रही थी। इस युद्ध में भारत की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हुई और दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गई। भले ही द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन की सहायता के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत को आजाद करने की शर्त रखी, लेकिन मांग अस्वीकार होने के बावजूद कांग्रेस अघोषित रूप से ब्रिटेन के पक्ष में और जर्मनी आदि धूरी राष्ट्रों के विरुद्ध काम करती रही। इस सच्चाई को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है कि अंग्रेजी हुकूमत से तालमेल रखना राजे रजवाड़े की मजबूरी थी। इसका यह मतलब नहीं है कि सभी राजे रजवाड़े अंग्रेजी शासन कायम रखने के पक्ष में थे या लोकतंत्र विरोधी थे। देखा यह गया कि जिन राजे रजवाड़ों ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में भरपूर सहयोग किया, आजादी के बाद उन्हें भी सियासत से निकाल कर दूध से मक्खी की तरह फेंक दिया गया। कहा गया कि बेशुमार दौलत इकट्ठा करने वाले रजवाड़े शोषक और अत्याचारी थे। लेकिन जब लोकतांत्रिक भारत में शासकों के घोटालों, लूट, बेइमानी के काले चिट्ठे खुलते हैं, जब किसी सुखराम की दौलत और किसी जयललिता – मायावती की विलासिता व शान शौकत की कहानी सामने आती है, जब स्विस बैंक में भारतीय राजनेताओं के अकाउंट का भंडाफोड़ होता है, जब नेशनल हेराल्ड की हजारों करोड़ की परिसंपत्तियां कौड़ियों के भाव में बेची-खरीदी जाती हैं , जब मंत्री, सांसद- विधायक बनते ही नेताजी रातों रात दौलतमंद हो जाते हैं, तो भारतीय इतिहास के अध्येता उन राजे रजवाड़ों से आज के राजनेताओं की नैतिकता, सुचिता व योगदान की तूलना करने पर मजबूर हो जाते हैं।
दरभंगा राज पर पंडित नेहरू की वक्र दृष्टि
कांग्रेस पार्टी इलाहाबाद में सन् 1892 में अधिवेशन करना चाहती थी, पर अंग्रेज हुकूमत ने किसी सार्वजनिक स्थल पर अधिवेशन की इजाजत नहीं दी। इसकी सूचना मिलने पर दरभंगा महाराजा ने वहां एक महल ही खरीद लिया। उसी महल के ग्राउंड पर कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। महाराजा ने वह महल कांग्रेस को ही दे दिया। अंतिम महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने भी राष्ट्रीय आन्दोलन में काफी योगदान दिया। वे वर्ष 1933-1946 तक, 1947-1952 तक भारत की संविधान सभा के सदस्य रहे। महात्मा गांधी तो उन्हें अपने पुत्र के समान मानते थे, लेकिन पंडित नेहरू उन्हें पसंद नहीं करते थे। आजादी के बाद जब 1952 में लोकसभा का पहला चुनाव हो रहा था, महाराजा कामेश्वर सिंह को कांग्रेस ने प्रत्याशी बनाना मुनासिब नहीं समझा। महाराजा जयनगर संसदीय क्षेत्र से मैदान में उतरे। पंडित नेहरू ने उनके खिलाफ श्यामनंदन मिश्र (पूर्व विदेश मंत्री) को कांग्रेस प्रत्याशी बनाया। महाराजा चुनाव हार गए।1962 में वे स्वतंत्र पार्टी से दोबारा दरभंगा से लोकसभा चुनाव लड़े, फिर हार गए। उन्हें झारखंड पार्टी ने संसद सदस्य (राज्य सभा 1952-1958) बनाया। वे 1960 में दूसरी बार राज्य सभा भेजे गए और 1962 में अपनी मृत्यु तक राज्य सभा के सदस्य रहे। आजाद भारत में दरभंगा राज पर कांग्रेसी शासकों की भृकुटी तनी रही। पत्रकार सुरेंद्र प्रसाद के शब्दों में -“दरभंगा से पंडित नेहरू उतना ही चिढ़ते थे, जितना नरेंद्र मोदी नेहरू से।” 1883 में दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह चुनाव जीतकर सदन पहुंचनेवाले पहले जनप्रतिनिधि थे। उन्हें ही रॉयल कोमोनियर की उपाधि मिली थी। 1883 से 1962 तक दरभंगा कभी सदन से बाहर नहीं रहा। ऐसी राजनीतिक विरासत न नेहरू के पास थी और न ही जिन्ना के पास।
स्वाधीनता आंदोलन के वित्तपोषक
“शाही परिवार राष्ट्रीय आंदोलन के सबसे बड़े वित्तपोषक थे। लेकिन वे प्रत्यक्ष राजनीति में नहीं थे। उन्होंने अपने स्थानीय नेताओं को नामित किया था, लेकिन स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस ने शाही परिवारों के प्रति अपना दृष्टिकोण बदल दिया था।” यह कहते हुए सुरसंड स्टेट के जमींदार अशोक हर्षवर्धन का दर्द छलकता है। वे बताते हैं कि कांग्रेस ने बड़ी क्रूरता से शाही परिवारों को कुचल दिया था। पंडित जवाहरलाल नेहरू को शाही परिवारों से बहुत समस्याएं थीं। महात्मा गांधी और सदर पटेल यथार्थवादी थे और वे ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में शाही परिवारों के महत्व को जानते थे। शाही परिवार देश के सबसे बड़े रोजगार प्रदाता थे और हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था उन पर आधारित थी। पहले सदर पटेल ने रियासतों का पूर्ण अनुग्रह के साथ विलय किया था और उन्होंने प्रिवी पर्स से अच्छी राशि कर मुक्त प्रदान की थी। लेकिन सदर पटेल की मृत्यु के बाद श्री नेहरू ने तालुकदारों, जागीरदारों और बड़े जमींदारों को कुचल दिया था।
एकतरफा इतिहास लेखन में भारत की उस ग्रामीण अर्थव्यवस्था की समीक्षा नहीं हो सकी, जो राजे रजवाड़े व जमींदारों के जमाने में विकसित हुई थी। ढाका के मलमल और बनारस की साड़ी जैसे उन्नत कुटीर उद्योगों से आगे हम आज तक नहीं बढ़ सके हैं। कभी संयुक्त बंगाल ( बिहार और उड़ीसा समेत) की खुशहाली और कच्चे माल की प्रचूरता से आकर्षित होकर ईस्ट इंडिया कंपनी ने कोलकाता में कारोबार शुरू किया था। जमींदारी उन्मूलन की वजह से देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई थी। आजादी के बाद सत्ता पर काबिज हुक्मरान तो चीनी मिलों को भी चालू नहीं रख पाए। खेती, कुटीर उद्योग और हमारे देश का सबसे बड़ा रोजगार क्षेत्र उजड़ गया। अस्सी के दशक में ये शाही परिवार हिन्दी फिल्मों के खलनायक बन गए। सरकारी नीतियों की वजह से शाही परिवारों ने अपना गौरव खो दिया। स्वतंत्रता आंदोलन और कांग्रेस पार्टी के गठन में शाही परिवारों के योगदान को कांग्रेसी भूल गए।
जमींदारी छीनी और सियासी पैमाने बदले
जमींदारी छीन जाने से राजे रजवाड़े आर्थिक व सामाजिक रूप से लाचार हुए। उसके बाद सियासत में भी उनकी घेराबंदी शुरू हो गई। बेला विलासपुर स्टेट के प्रकाश राय कहते हैं कि बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने 1950 में जमींदारी उन्मूलन अधिनियम लाकर राजे रजवाड़े, जमींदारों, बड़े किसानों को हमेशा के लिए बर्बाद कर दिया। उन्होंने देश के कई राज्यों में जमींदारों के खिलाफ माहौल पैदा किया। विलासपुर स्टेट किसी की मेहरबानी से नहीं, पीढ़ियों की मेहनत से कायम हुआ। बलराम प्रसाद राय ने 1940 में अंग्रेजों से निलामी में 114 एकड़ जमीन खरीदी। महात्मा गांधी की याद में वृंदावन आश्रम ( भितिहरवा) के विकास एवं शिक्षण संस्थान की स्थापना के लिए विलासपुर स्टेट ने जमीन दान की।
धरहारा स्टेट के डाॅ. प्रगति सिन्हा कहते हैं- हमारे परिवार को तो सरकार से जमींदारी का मुआवजा तक नहीं मिला। धरहरा स्टेट के पास कभी 22000 एकड़ की जमींदारी थी। हमें मुगलों या अंग्रेजों से उपहार में जागीरदारी नहीं मिली थी, हमारे पूर्वज ने अपनी वर्षों की मेहनत व काबिलियत से जमींदारी अर्जित की थी। संसदीय राजनीति से अलग होने पर हमारे पिता विरासत में 220 एकड़ जमीन भी नहीं छोड़ सके। कहां चली गई हमारी जमींदारी? बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, लंगट सिंह कालेज और बीबी काॅलेजिएट हाई स्कूल से लेकर कांटी थर्मल पॉवर स्टेशन तक संपत्ति दान करते रहे। जैसे आज के सियासी घराने धन दौलत अर्जित कर रहे हैं, वैसे जागीरदारों व जमींदारों ने कभी अपने परिवार के लिए राजनीति को माध्यम नहीं बनाया। इसके बावजूद हम उपेक्षा के शिकार हुए।
सदर अस्पताल में हथुआ वार्ड
मुजफ्फरपुर सदर अस्पताल में आज भी हथुआ वार्ड है।
राज्य के किसी जिले में शहर से गांव तक पुराने अस्पताल, हाई स्कूल व काॅलेज का इतिहास खंगालिए, पता चलेगा कि किसी राजा या स्टेट ने बनवाया था। गरीबों के इलाज के लिए दरभंगा में 1878 में महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह ने 200 बेड का द राज हॉस्पीटल खोला था। यह अस्पताल तत्कालीन बंगाल राज्य का दूसरा सबसे बड़ा अस्पताल था, जहां अफगानिस्तान, नेपाल और देश के दूसरे राज्यों से मरीज मुफ्त में इलाज कराने आते थे। समाज कल्याण, स्वतंत्रता संग्राम में उल्लेखनीय भूमिका, शिक्षण संस्थानों की स्थापना की बदौलत राजे रजवाड़े आजादी के बाद सियासत में पैर जमाए थे। उनमें से कई चुनावों में जीतकर लोक सभा व विधानसभा के सदस्य भी बने। लेकिन जमींदारी छीन जाने के बाद पुराने सियासी घरानों की धीरे धीरे कमर टूटती चली गई। सामाजिक कार्यों में सहयोग के लिए धन का अभाव और रोजी- रोटी देने में अक्षम रजवाड़ों की समाज में पहले जैसी लोकप्रियता नहीं रह गई। जैतपुर स्टेट के अनुनय सिन्हा बताते हैं कि दक्षिण भारत में कई रजवाड़े व जमींदारों ने खेती की जगह उद्योग व्यवसाय में हाथ आजमाया। वे आर्थिक रूप से समृद्ध व सुरक्षित हुए और सियासत में भी अपना पैर जमाए रखने में सफल हुए। बिहार में दरभंगा को छोड़कर अधिकांश राजे रजवाड़े खेती के अलावा उद्योग व्यवसाय स्थापित नहीं कर सके। जमींदारी छीन जाने से वे आर्थिक -राजनीतिक रूप से उत्तरोत्तर कमजोर होते चले गए। उनकी आज की पीढ़ियां डाक्टरी, वकालत और दूसरी नौकरियों से जीविकोपार्जन कर रही हैं। आज की राजनीति में अलग तरह की योग्यताएं अपेक्षित हैं।
महाराजा, जिसने स्थापित किया औद्योगिक साम्राज्य
नेपाल सीमा से गंगा किनारे तक दरभंगा राज की जमींदारी थी।ब्रिटिश राज के दौरान तत्कालीन बंगाल के 18 सर्किल के 4,495 गांव दरभंगा नरेश के शासन में थे। राज के शासन-प्रशासन को देखने के लिए लगभग 7,500 अधिकारी बहाल थे। ये किसी रियासत के राजा नहीं, बल्कि ब्रिटिश काल में देश के सबसे बड़े जमींदार थे। अंग्रेजी हुकूमत ने इन्हें महाराजाधिराज की उपाधि दी। आज के शासक बाहरी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए अथक प्रयास करते हैं। औद्योगिक घराने बिहार आने से मुंह सिकोड़ने लगते हैं। दशकों से अधर में लटकी सड़क पुल एवं रेल परियोजनाओं का निर्लज्जता से श्रेय लिया जाता है। जब वर्षों बाद दरभंगा एयरपोर्ट से विमानों की उड़ान का श्रेय लेने की होड़ लगती है तो दरभंगा के महाराजा कामेश्वर सिंह के प्रति हमारी कृतघ्नता से पीड़ा के मवाद बहने लगते हैं। बिहार में आज तक का सबसे बड़ा निवेशक दरभंगा राज को माना जाएगा। बात 1873-74 की है। बिहार में भयानक सूखा और अकाल पड़ा तो दरभंगा राज के क्षेत्र में राहत के अनाज की ढुलाई मुश्किल थी। जनता को राहत व रोजगार देने के लिए दरभंगा महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह ने तिरहुत रेल कंपनी की स्थापना की। एक हजार मजदूरों ने एक साल के रिकार्ड समय में बरौनी के बाजितपुर से दरभंगा तक रेल मार्ग का निर्माण किया। 1875 में मालगाड़ी व सवारी गाड़ी का परिचालन शुरू हो गया। नरगौना पैलेस तक रेलगाड़ी चलती थी। उत्तर बिहार और नेपाल सीमा तक रेलवे का जाल बिछाने में तिरहुत रेल कंपनी का बड़ा योगदान है। कामेश्वर सिंह भी आधुनिक सोच वाले देश के पहले ऐसे महाराजा थे, जिन्होंने बड़ा औद्योगिक साम्राज्य स्थापित किया था। वे तेजी से बदल रही दुनिया के साथ कदम मिलाना जानते थे। राज सिर्फ किसानों से खिराज की वसूली पर ही आधारित नहीं रहा। महाराजा ने कई कंपनियों की शुरुआत की थी। नील के व्यवसाय के अलावा महाराजाधिराज ने मुक्तापुर में रामेश्वर जूट मील, लोहट और सकरी में सुगर फैक्ट्री, हायाघाट में अशोक पेपर मील, कोलकाता में वाल्फोर्ड ट्रांसपोर्ट कंपनी की स्थापना की। दरभंगा महाराज की थैकर्स एंड स्प्रंक कंपनी स्टेशनरी का निर्माण करने वाली पूर्वी भारत की सबसे बड़ी कंपनी थी। इन प्रतिष्ठानों में हजारों लोगों को रोजगार मिला। आय के नये स्रोत बने। कामेश्वर सिंह 1935 में दरभंगा में स्थापित अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ के संरक्षक थे। उन्होंने कोलकाता में दरभंगा कप टूर्नामेंट शुरू किया था।
दरभंगा राज की एविएशन कंपनी थी। यह देश की पहली एविएशन कंपनी थी। इसमें यात्री विमान के साथ कार्गो फ्लाइट्स भी थी। राज परिवार के पास पांच डगलस डीसी-3 विमान थे। दरभंगा में 1917 में एयरपोर्ट का निर्माण किया गया। महाराजा रामेश्वर सिंह ने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान 1917 में अमेरिका से एक विमान खरीद कर ब्रिटिश राज में भारतीय सेना को दिया था। दूसरे विश्वयुद्ध के वक्त दरभंगा महाराज ने एयरफोर्स को तीन फाइटर प्लेन दिए। दरभंगा एविएशन कंपनी के विमान 1950 से 1962 तक उड़े। चीन से युद्ध के वक्त 1962 में दरभंगा एयरपोर्ट को भारतीय वायुसेना ने अपने कब्जे में लिया। पत्रकारिता के क्षेत्र में कामेश्वर सिंह ने महत्त्वपूर्ण काम किया। उन्होंने ‘न्यूजपेपर एंड पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड’ की स्थापना की। अंग्रेजी में ‘द इंडियन नेशन’, हिन्दी में ‘आर्यावर्त’ और मैथिली पत्रिका ‘मिथिला मिहिर’ का प्रकाशन किया। एक अक्टूबर 1962 को महाराजा कामेश्वर सिंह की संदिग्ध मौत के साथ दरभंगा राज और उसके औद्योगिक साम्राज्य के विनाश की शुरुआत हुई। पत्रकार शिवनाथ झा के शब्दों में – “महाराजाधिराज की सम्पूर्ण इच्छाएं, अभिलाषाएं, मनोकामनाएं, स्वतंत्र भारत में दरभंगा को एक नई ऊंचाई तक ले जाने का सपना उनके पार्थिव शरीर के साथ सुपुर्दे ख़ाक हो गया।”
उत्तराधिकार की लड़ाई और सियासी गिद्ध दृष्टि
महाराजा कामेश्वर सिंह ने तीन शादियां की, परन्तु तीन पत्नियों में से किसी ने भी उन्हें कोई संतान नहीं दी। महाराजा ने वसीयत के माध्यम से दो जीवित महारानियों को रहने के लिए एक -एक महल, मासिक पेंशन और आम जनता के कल्याण के लिए ट्रस्ट के माध्यम से अपनी एक तिहाई संपत्ति तो दी, परन्तु तीन जीवित भतीजों ( राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के पुत्र) को कुछ नहीं दिया। इस पर प्रकाश डालना, गड़े मुर्दे उखाड़ना होगा कि महाराजा ने भतीजों को राजा ( उत्तराधिकारी) बनने के योग्य क्यों नहीं समझा? उन्हें संपत्ति में हिस्सा क्यों नहीं दिया? महाराजा की तरह सबसे बड़े भतीजे राज कुमार जीवेश्वर सिंह को भी कोई पुत्र नहीं था, जबकि राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह व कुमार शुभेश्वर सिंह नाबालिग थे। वसीयत के अनुसार दोनों महारानी के जिन्दा रहने तक संपत्ति का देखभाल ट्रस्ट के अधीन रहना था। दोनों महारानी के स्वर्गवाशी होने के बाद संपत्ति को तीन हिस्सा में बांटना था। एक हिस्सा दरभंगा के जनता के कल्याणार्थ देने और शेष हिस्सा तीनों भतीजों ( जीवेश्वर सिंह, यज्ञेश्वर सिंह और शुभेश्वर सिंह) की संतानों में बांटने का प्रावधान था। महाराजा कामेश्वर सिंह ने वसीयत में एक शर्त रखी थी – अगर भतीजे किसी श्रोत्रिय ब्राह्मण परिवार की बेटी से विवाह करेंगे, तभी उनकी संतानें संपत्ति की हकदार होंगी। किसी भी पक्ष ने वसीयत का सम्मान नहीं किया। संपत्ति बंटवारे के झगड़े, खींचतान, बेचने कब्जा करने के षड्यंत्रों, मुकदमेबाजी और अंतर्कलह में एक -दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं गंवाया। महाराजा की चाहे जो मजबूरी रही हो, दरभंगा राज के पतन के बीज तो वसीयत में भी छिपे थे। इसे हिस्सेदारों की मजबूरी कहिए या उनकी बेताबी, बेइमानी, लालच या कमजोरी में से कुछ भी कहिए, सबने दरभंगा राज के वैभव को खंडित किया। उनमें नई इबारत लिखने की काबिलियत नहीं थी, सिर्फ मिटाना जानते थे। कौन अधिक दोषी था और कौन कम, इस पचड़े में फंसने के बजाय यह बताना जरूरी है कि हमारे हुक्मरान ने भी दरभंगा राज को इमानदारी से बचाने के बजाय, उजाड़ने का काम किया। बिल्लियों के झगड़े में बंदर रोटी बांटता दिखा। महलों के रहबर ही रहजन बने। अलग अलग पदों और ट्रस्टों में तैनात अधिकारी ‘लूट में चर्खा नफा’ को चरितार्थ करते रहे। नाते रिश्तेदारों, चाटुकारों, दलालों, ट्रस्ट के अधिकारियों ने झगड़े उलझाने और मलाई मारने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बड़ी महारानी राजलक्ष्मी जी का निधन हो चुका है। छोटी महारानी कामसुन्दरी ने ‘महाराज कामेश्वर सिंह कल्याणी ट्रस्ट’ बनवाया, जिसके तहत शोध व किताबों का प्रकाशन, महाराजा कामेश्वर सिंह जयंती का आयोजन कराती हैं। चमक दमक से बिल्कुल दूर एकांत में सादगी से रह रही बुजुर्ग निसंतान महारानी को उनके तथाकथित अपने ही लांछित अपमानित कराते रहे हैं। वे प्रारब्ध का हलाहल चुपचाप पीती जा रही हैं। महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की पत्नी महारानी कामसुंदरी देवी चुप हैं, लेकिन चाटुकार लेखक उन्हें अपमानित करने से चूकते नहीं हैं।
वर्षों तक आर्यावर्त में कार्यरत रहे वरिष्ठ पत्रकार शिवनारायण सिंह याद करते हैं – आर्यावर्त- इंडियन नेशन का स्वामित्व राजकुमार शुभेश्वर सिंह के हाथ में आ गया था। अखबारों समेत दरभंगा राज की तमाम परिसंपत्तियों के लिए कोर्ट में लड़ाई चल रही थी। शुभेश्वर सिंह के वकील ने किसी तरह कोर्ट में लड़ाई को लंबा खींचने की सलाह दी। उन्हें डर था कि वसीयत के अनुसार कोर्ट के फैसले में शुभेश्वर सिंह को कुछ भी नहीं मिलेगा। शुभेश्वर सिंह बेतहाशा पैसे खर्च कर कोर्ट की लड़ाई को लंबी खींचते रहे सियासी संपर्क व ताकत के लिए दोनों अखबारों का भरपूर इस्तेमाल करते रहे। शिवनारायण सिंह को अच्छी तरह याद है कि शुरू में शुभेश्वर सिंह की रणनीति के तहत दोनों अखबार में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र के पक्ष में खबरें छपवाते रहे। बाद में शुभेश्वर सिंह को महसूस हुआ कि जगन्नाथ मिश्र महारानी कामसुंदरी देवी का पक्ष ले रहे हैं, तो उन्होंने खबरों के माध्यम से जगन्नाथ मिश्र सरकार की विफलताओं के गोले दागने शुरू किए। डॉ. मिश्र के खिलाफ लगातार छप रही खबरें मर्यादा लांघती रहीं। जगन्नाथ मिश्र की नजर दरभंगा राज के महलों व जमीन पर थी। महारानी और भतीजों के बीच लड़ाई का लाभ उठाते हुए डॉ. मिश्र दरभंगा राज की जमीन व ऐतिहासिक महलों की बिक्री कराने में सफल हुए। ललित नारायण मिश्रा मिथिला विश्वविद्यालय के लिए बिहार सरकार ने 1975 में 70 लाख रुपए में दो महलों समेत 250 एकड़ भूमि खरीद ली। शुभेश्वर सिंह ने आरोप लगाया कि आपातकाल के दौरान मुख्यमंत्री मिश्रा के दबाव में जमीन की बिक्री की गई थी।
शतरंज के मोहरे बने वारिस
सिर्फ दरभंगा राज की पारिवारिक छीनाझपटी में ऐतिहासिक महलों की बिक्री नहीं हुई, बिहार के सत्ताधारी राजनेता ने भी वारिसों को शतरंज का मोहरा बनाया। कामेश्वर सिंह के जीवन काल में युवराज जीवेश्वर सिंह की पत्नी महारानी राजकिशोरी दरभंगा के नरगौना पैलेस में ही रहीं। महाराजा के निधन के बाद वसीयत में युवराज को बेदखल कर दिया गया था। इसके बाद राजकिशोरी अपने पति के साथ बेला पैलेस में रहने लगीं। राज्य सरकार ने जब बेला पैलेस का भी अधिग्रहण कर लिया तो राजकिशोरी यूरोपियन गेस्ट हाउस में रहने लगीं। लेकिन सरकार ने आपातकाल के दौरान उसका भी अधिग्रहण कर लिया। अंततः महारानी ने अपने आभूषणों को बेचकर लहेरिया सराय के बलभद्रपुर में जमीन खरीदी और दो मंजिला मकान बनायीं। इसी मकान में वे अपने जीवन की अंतिम सांस तक रहीं। यह त्रासदी दरभंगा राज घराने की उस बहू की है, जिनकी शादी के बाद ससुर कामेश्वर सिंह बहू – भतीजे को बड़े प्यार से अपनी कार में राजभवन लाया था।
जब मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र ने बिहार के सर्वाधिक लोकप्रिय अखबारों आर्यावर्त और इंडियन नेशन को मिल रहे सरकारी विज्ञापन को कम कर दिया तो दरभंगा के राज कुमार शुभेश्वर सिंह ने जवाबी कार्रवाई में राजनीति में प्रवेश की धमकी दे डाली। डॉ. मिश्र ने बदले में कहा- उन्हें सूचना मिली थी कि शुभेश्वर सिंह ने दरभंगा की महारानी कामसुंदरी देवी को मारने की साजिश रची थी। दरभंगा राज परिवार ब्राह्मणों के श्रोत्रिय संप्रदाय का प्रतिनिधित्व करता था। श्रोत्रिय समेत संपूर्ण मैथिली ब्राह्मण समाज और आम जनता में महाराजा कामेश्वर सिंह की व्यापक लोकप्रियता थी, लेकिन राज कुमार शुभेश्वर सिंह कभी जननेता बनने का सफल प्रयास नहीं कर सके थे। वे मैथिली ब्राह्मण डॉ. जगन्नाथ मिश्रा की राजनीति का वित्तपोषण कर रहे थे। मोहभंग होने पर अपना समर्थन वापस ले लिया, परन्तु डॉ. मिश्र की राजनीतिक जमीन पर कभी चुनौती नहीं बन सके।
सिंहासन- सियासत संभालने की हैसियत नहीं
दरभंगा राज की विरासत सिकुड़ चुकी है। आजकल परिसंपत्तियों की खरीद-बिक्री पर रोक है और तहकीकात न्यायमूर्ति कर रहे हैं। दरभंगा राज की जीवित पीढ़ी में से किसी एक को आज न तो सिंहासन पर बैठने का अधिकार है और न ही वे सूबे की सियासत में पैर जमाने की काबिलियत रखते हैं। सियासत में कदम रखने की कोई कोशिश भी नहीं कर रहा है।दरभंगा के ऐतिहासिक राज किला पर 59 वर्षों बाद कुमार शुभेश्वर सिंह के छोटे बेटे कुमार कपिलेश्वर सिंह ने 26 जनवरी 2021 को ध्वजारोहण किया। इस समारोह को राजनीतिक पारी की शुरुआत नहीं, बल्कि बची हुई संपत्ति पर दावेदारी के रूप में देखा गया। दरभंगा राज के वंशजों की लंबी सूची है। सबसे बड़े राज कुमार स्व. जीवेश्वर सिंह की पुत्रियां कात्यायनी, दिव्यायानी, नेत्रयानी दाई, चेतना दाई, द्रौपदी दाई, अनीता दाई एवं सुनीता दाई हैं। दूसरे राज कुमार स्व. यज्ञेश्वर सिंह के दो पुत्र कुमार रत्नेश्वर सिंह और रजनेश्वर सिंह हैं। रजनेश्वर सिंह के पुत्र ऋत्विक सिंह हैं। सबसे छोटे राज कुमार स्व. शुभेश्वर सिंह के पुत्र राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह हैं। इस वंशावली पर नजर दौड़ाते हुए बड़ी पीड़ा महसूस होती है। दरभंगा राज के महलों के प्राचीर पर नजर दौड़ाते हुए अल्लामा इकबाल एक शेर याद आता है – “हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है. बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा ।”









