शिवानंद तिवारी
- मकड़ी के जाले से लेकर रोबोट के हाथों तक – चिकित्सा के बदलते दौर की कहानी
- जब मामी का ऑपरेशन नुहरनी से हुआ था, आज चीन से हैदराबाद में सर्जरी हो रही है
- दलन छपरा से दुनिया तक: घाव पर नीम-मलीदा से लेकर रिमोट सर्जरी तक का सफर
- हमने अपनी ही जिंदगी में दुनिया को बदलते देखा है
कुछ दिन पहले एक खबर पढ़ी थी। एक डॉक्टर ने चीन में बैठकर हैदराबाद के किसी आदमी का ऑपरेशन कर दिया। आधुनिक तकनीक से रोबोट के जरिए तीन-चार हजार किलोमीटर दूर बैठे डॉक्टर ने ऑपरेशन किया और ऑपरेशन सफल रहा। आश्चर्य की चीजें दुनिया में हो रही हैं। हम लोग भी अपने जीवन में छोटी-मोटी चीजों के इस्तेमाल से इसे महसूस कर रहे हैं। दुनिया कितनी बदल गई है।
मुझे याद है, बचपन में मैं अपने मामा के यहाँ गया था। मेरा ममहर बलिया जिले में था—दलन छपरा, दूबे टोला। बहुत सामान्य परिवार था। मेरी मामी के गले में, कान के नीचे दाईं तरफ एक घाव था। अंदर ही अंदर वह फूलकर पक गया था और उन्हें काफी कष्ट हो रहा था। उन दिनों आधुनिक चिकित्सा की सुविधा बहुत कमजोर थी। हमारे समाज में ऊँची जाति के लोगों को मवाद, खून या मुर्दा छूने से जाति अपवित्र होने का भय रहता था। शायद इसी वजह से मेडिकल की पढ़ाई और चिकित्सा का काम भी हमारे समाज में बहुत धीरे-धीरे फैला।
उस जमाने में हजाम लोग ही कई बार सर्जरी का काम कर देते थे। मेरी मामी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक हजाम आए। उन्होंने घाव को छूकर देखा। नाखून काटने के काम में आने वाली नुहरनी को गरम पानी से धोया। मेरी मामी को तीन-चार लोगों ने कसकर पकड़ लिया, ताकि वह हिल-डुल न सकें। फिर उस ‘सर्जन’ ने नुहरनी से उनके घाव को काटा। जैसे ही नुहरनी घाव पर लगी, पके हुए घाव के अंदर से मवाद बाहर निकलने लगा। मामी चिल्ला रही थीं। उन्होंने पूरा मवाद निकाल दिया। उसके बाद नीम के पत्तों को कूट-कूटकर मलीदा बनाया और उसे पहले से तैयार साफ कपड़े की पट्टी पर रखकर मामी के गले में लपेटकर बाँध दिया। दो-तीन दिन पट्टी बदलने के बाद घाव सूखने लगा। लेकिन उस समय मामी जिस तरह छटपटा रही थीं, वह दृश्य आज भी याद है।
मुझे भी अपने बचपन में घाव के इलाज का एक अनुभव आज तक याद है। हमारे गाँव के किनारे एक नदी बहती थी। अब तो आम दिनों में वह नदी नाला बन गई है। नदी पर अब नया पुल बन गया है। पुराना पुल अंग्रेजों के जमाने का था, लोहे के ढाँचे पर बना हुआ। मेरे बचपन में उस नदी में सालों भर पानी रहता था। बरसात में तो नदी उफना जाती थी। गाँव के नौजवान ही नहीं, अधेड़ लोग भी पुल से नदी में छलांग लगाते थे। आम दिनों में भी नदी में खूब पानी रहता था। पुल के नीचे कमर भर पानी रहता था और बाकी जगह ठेहुन और जाँघ भर पानी रहता था।
हम बच्चे पुल के नीचे लोहे के गार्टर पर चढ़कर इधर से उधर पानी में कूदा करते थे। इसी कूदा-कूदी में एक दिन मेरे घुटने के नीचे लोहे के गाटर से ऐसी चोट लगी कि ठेहुन के नीचे की चमड़ी निकल गई।
अब क्या किया जाए? उस जमाने में गाँवों में घरेलू इलाज का अपना ही तरीका था। आज शहरों के घरों में शायद ही मकड़ी का जाला दिखाई देता हो, लेकिन उन दिनों लगभग हर घर में मकड़ी के जाले दिखाई देते थे। गाँव में यह धारणा प्रचलित थी कि ताजा घाव पर मकड़ी का जाला चिपका देने से घाव ठीक हो जाता है। पता नहीं आज भी कोई इस बात को जानता है या नहीं, लेकिन उस समय लोगों को इस पर पूरा विश्वास था। मेरे घाव पर भी मकड़ी का जाला चिपका दिया गया।
लेकिन कुछ दिनों बाद घाव पक गया। उसमें पीब भर गई और वह बहने लगा। तब लोग मुझे गाँव के बगल में, करीब एक किलोमीटर दूर सलेमपुर ले गए। उस गाँव को बंगला भी कहा जाता था। वहाँ सुकुल जी नाम के एक डॉक्टर थे। वे मेडिकल कॉलेज के पढ़े हुए डॉक्टर नहीं थे, लेकिन गाँव में डॉक्टर के रूप में ही जाने जाते थे।
मुझे उनके सामने बैठाया गया। सुकुल जी ने ऊपर लगा हुआ मकड़ी का जाला हटाया और घाव को साफ किया। फिर उन्होंने कोई पाउडर घाव पर डाला। पता नहीं वह कौन-सा पाउडर था। आज भी जब उस घटना को याद करता हूँ तो जैसे उस दर्द का अनुभव होने लगता है। लोग मुझे पकड़े हुए थे, मैं चिल्ला रहा था और सुकुल जी उस भूरे रंग के पाउडर से घाव को साफ कर रहे थे। उसके बाद धीरे-धीरे घाव ठीक हुआ। लेकिन उस इलाज में मुझे बहुत कष्ट सहना पड़ा था।
आज जब मैं इन दोनों घटनाओं को याद करता हूँ तो लगता है कि दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई है। एक समय था जब नुहरनी से घाव काटकर मवाद निकाला जाता था, नीम के पत्तों का मलीदा लगाकर पट्टी बाँधी जाती थी, और घाव पर मकड़ी का जाला चिपकाना भी इलाज माना जाता था। फिर डॉक्टर आए, अस्पताल आए, आधुनिक चिकित्सा आई और अब रोबोटिक सर्जरी का जमाना है—जहाँ हजारों किलोमीटर दूर बैठा डॉक्टर रोबोट के जरिए किसी मरीज का ऑपरेशन कर रहा है।
जिस दुनिया में मैंने बचपन बिताया, उससे आज की दुनिया को मिलाकर देखता हूँ तो सचमुच विश्वास करना मुश्किल होता है कि इतनी बड़ी तब्दीली हमारी ही जिंदगी में हो गई है।







