संस्थाएँ अयोग्य लोगों से नहीं, योग्यता से डरने वाली संस्कृति से मरती हैं✒️ निरंजन

डॉ निरंजन

1. संस्थाएँ अयोग्य लोगों से नहीं, योग्यता से डरने वाली संस्कृति से मरती हैं
2. जब फाइलें किताबों पर भारी पड़ने लगें, समझो संस्था बीमार है
3. कुर्सी बड़ी, कद छोटा: संस्थानों के पतन की अनकही कहानी


शिक्षण संस्थानों और चिकित्सा जगत में जीवन के 25 वर्ष बिताने के बाद मैंने एक विचित्र सत्य को बहुत करीब से देखा है।

योग्य व्यक्ति से सबसे अधिक परेशानी हमेशा उसके विरोधी को नहीं होती, कई बार उस व्यक्ति को होती है जिसकी कुर्सी तो बड़ी है, लेकिन कद छोटा है।

एक आत्मविश्वासी व्यक्ति अपने से अधिक विद्वान को देखकर प्रसन्न होता है। वह उससे सीखता है, उसे आगे बढ़ाता है और उसकी प्रतिभा को संस्था की शक्ति बना देता है।

लेकिन एक असुरक्षित व्यक्ति उसी दृश्य को अलग नजर से देखता है। उसे दूसरे का ज्ञान अपनी कमी की याद दिलाता है। उसकी लोकप्रियता उसे अपना घटता प्रभाव लगती है। उसका आत्मसम्मान उसे अहंकार दिखाई देता है, उसकी स्पष्टवादिता अनुशासनहीनता और उसकी स्वतंत्र सोच चुनौती लगने लगती है।

यहीं से एक शांत युद्ध शुरू होता है

इस युद्ध में किताबें नहीं, फाइलें खुलती हैं। ज्ञान का मुकाबला ज्ञान से नहीं, कानाफूसी से होता है। एकेडमिक डिस्कशन की जगह दरबार सजने लगता है। फिर योग्य व्यक्ति की छोटी-सी गलती भी ऊपर तक पहुँच जाती है और उसकी बड़ी उपलब्धियाँ रास्ते में ही खो जाती हैं।

धीरे-धीरे मालिक के आसपास ऐसे लोगों का घेरा बन जाता है जिनकी सबसे बड़ी योग्यता यह नहीं होती कि वे कितना जानते हैं, बल्कि यह होती है कि वे मालिक को वही सुनाना जानते हैं जो मालिक सुनना चाहता है।

यही किसी संस्था के पतन की शुरुआत है

चापलूस व्यक्ति केवल अपनी जगह नहीं बनाता, अपनी जगह सुरक्षित रखने के लिए वह अपने आसपास ऐसे लोगों को पसंद करता है जिनसे उसकी तुलना न हो सके। तब एक खतरनाक सिलसिला शुरू होता है – योग्यता असुविधाजनक लगने लगती है, सवाल पूछना अपराध बन जाता है, असहमति को विद्रोह समझा जाने लगता है और वफादारी का अर्थ संस्था के प्रति निष्ठा नहीं, किसी व्यक्ति के प्रति निष्ठा हो जाता है।

सबसे दुखद यह है कि योग्य व्यक्ति के हटने के बाद संस्था तुरंत नहीं गिरती। इमारत वहीं रहती है, बोर्ड पर नाम वही रहता है, कक्षाएँ चलती रहती हैं, बैठकों में सब सामान्य दिखता है। लेकिन कुछ अदृश्य चीजें धीरे-धीरे खत्म होने लगती हैं – ज्ञान की परंपरा, सवाल पूछने का साहस, विद्यार्थियों की प्रेरणा और एक्सीलेंस की वह संस्कृति जिसे बनाने में दशकों लगते हैं।

चिकित्सा शिक्षा में यह और भी गंभीर है। एक अनुभवी प्रोफेसर केवल सिलेबस नहीं पढ़ाता। वर्षों के मरीजों, गलतियों, सफलताओं और क्लिनिकल ऑब्जरवेशन से अर्जित जो जजमेंट वह अगली पीढ़ी को देता है, उसे किसी पुस्तक, पावरपॉइंट या सर्कुलर से बदला नहीं जा सकता। इसलिए जब किसी मेडिकल संस्थान से एक जेन्युइन टीचर बाहर जाता है, तो केवल एक कर्मचारी कम नहीं होता, उसके साथ वर्षों की इंस्टीट्यूशनल मेमोरी भी बाहर चली जाती है।

इतिहास का सामान्य सबक है: कमजोर नेतृत्व अपने आसपास प्रशंसक इकट्ठा करता है, मजबूत नेतृत्व प्रतिभाशाली लोगों को।

सच्चा लीडर उस प्रोफेसर से नहीं डरता जो उससे अधिक जानता है। वह गर्व करता है कि उसकी संस्था में ऐसा व्यक्ति मौजूद है, क्योंकि उसका उद्देश्य अपनी कुर्सी को बड़ा दिखाना नहीं, संस्था को बड़ा बनाना होता है।

इसलिए किसी संस्था की गुणवत्ता जानने के लिए उसकी इमारतों की ऊँचाई मत देखिए। यह देखिए कि वहाँ सबसे विद्वान व्यक्ति के साथ व्यवहार कैसा होता है। क्या उसकी बात सुनी जाती है? क्या उसे असहमति का अधिकार है? क्या एक्सीलेंस को सम्मान मिलता है?

इन प्रश्नों के उत्तर ही उस संस्था का वास्तविक चरित्र बताते हैं

मैंने जीवन से इतना अवश्य सीखा है – पद आपको अधिकार दे सकता है, लेकिन कद नहीं। कुर्सी आपको बड़ा दिखा सकती है, लेकिन बड़ा बना नहीं सकती। किसी विद्वान को संस्था से बाहर किया जा सकता है, उसके ज्ञान को छोटा नहीं किया जा सकता।

अंततः समय दोनों का मूल्यांकन करता है – किसने संस्था बनाई और किसने केवल अपनी कुर्सी बचाई।

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