अनूप
बंगाल से बिहार का पुराना नाता रहा है #आजादी के पहले से ही #बिहारियो के लिए परदेश का मतलब ही बंगाल होता था। संयुक्त #बिहार में उत्तर बिहार सबसे ज्यादा पिछड़ा इलाका था आबादी ज्यादा थी रोजी #रोजगार की संभावनाएं नाम मात्र की भी नहीं थी आज भी नहीं पर उसे समय यातायात के इतने सुगम साधन नहीं थे कि लोग दूसरे प्रदेशों में भी आसानी से रोजगार की तलाश में चल जाए उत्तर बिहार से बिहार की राजधानी #पटना आने के लिए पानी की जहाज चलती थी जिन्हें #स्टीमर कहा जाता था पटना से ट्रेन सुविधा थी इसके माध्यम से लोग बंगाल रोजगार की तलाश में जाते थे। पहले बंगाल में #जूट मिलों का ज़खीड़ा था। जहां जुट के बोरे बनाए जाते थे जिन्हें आम बोलचाल की भाषा में चट्टी कहा जाता था और इस चट्टी के निर्माण वाले मिल को बिहारी के शब्दों में #चटकल बांग्लादेश में #चटगांव भी कहीं ना कहीं इसी चट्टी और चटकल शब्द का मिश्रण से बना। आजादी के पहले जितने भी चटकल यानी जुट मिल थे वह वर्तमान के पश्चिम बंगाल में थी जबकि जुट का उत्पादन #ढाका से लेकर चटगांव तक होता था जो विभाजन के बाद #बांग्लादेश में चली गई धीरे-धीरे कच्चा माल उपलब्ध नहीं होने के कारण मिले बंद होने लगी बावजूद इसके 90 के दशक तक चटकल में बिहारियो को आसानी से काम मिल जाता था यह मिल साल के सात आठ महीने तक ही संचालित होती थी बाकी के 5 महीने इसके मजदूर बेरोजगार रहते थे और वह अपने गांव वापस लौट आते थे। बिहारी मजदूरों ने लूंगी पहनना और बीड़ी पीना भी बंगाल में ही सीखा साथ में से बिहार लेते आए। 70 80 के दशक तक उत्तर बिहार का सर्वाधिक पूजा सब परिवार था जिसके घर के कमाने वाले लोग बंगाल में मजदूरी नहीं करते थे। हाथ रिक्शा खींचने से लेकर सड़क के किनारे सत्तू बेचने मेहनत मजदूरी करने वाले लोग बंगाल में बिहार के ही भरे पड़े थे। बंगाल के लोग बिहारी के ईमानदारी के मुरीद थे सस्ता श्रम आसानी से उपलब्ध हो जाता था पर जो बिहार बंगाल कमाने जाते थे वह बंगाल के रूपसियों के जादू में फंस कर रह जाते थे अधिकांश लोग वहां की महिलाओं से विवाह करके वही बस जाते थे इसी व्यवस्था को लेकर भोजपुरिया लोक गीत संगीत में बंगाल की महिलाओं को जादूगरनि की उपमा दी गई। भोजपुरी के शेक्सपियर की उपाधि प्राप्त भिखारी ठाकुर के सबसे प्रसिद्ध नाटक के पृष्ठभूमि विषय वस्तु पर लिखी गई विदेशिया कमाने गया और वहां सुंदरी के रूप चाल में फंस गया भिखारी ने उसे दर्द को काफी नजदीक से देखा था उसे गीत संगीत में पिरोया दर्द चुकी घर-घर का था इसलिए उसे जमाने में भी वायरल था आज भी भिखारी_ठाकुर का विदेशिया नाटक इतने ही चाव से देखा जाता है जितना की पहले देखा जाता था पहले पर्दे पर भी इस दर्द को उकेरा गया। बिहार पुरुष प्रधान राज्य था तो बंगाल स्त्री प्रधान। हर सिक्के का दूसरा पहलू होता है भोजपुरी के गीत संगीत को देखिए उसमें बंगाल की महिलाओं के रूप रंग का नक्श से लेकर शिख तक का वर्णन किया गया है उनकी सुंदरता का उनकी कामुकता का उनके रूप सौंदर्य के तिलिस्म का। भोजपुरी लोकगीतों में स्त्री के हर बिरह में बंगाल में जाकर अपने घर परिवार को भूल चुके पति के विछोह वेदना साफ झलकती है। हाल ही में आसनसोल से भोजपुरी के गायक पवन सिंह को टिकट दिया गया तो इस विषय पर जमकर विवाद हो गया विरोधी तृणमूल के तमाम छोटे बड़े नेताओं ने पवन सिंह पर बंगाली महिलाओं के प्रति गंदे गाने गाने का आरोप लगाया अरुण नेताओं को जरूर समझना चाहिए की लगभग एक लाख बंगाल की लड़कियां बिहार में आकर आर्केस्ट्रा ग्रुप नाच मंडलियों तथा बार डांसर के रूप में बस गई है। बिहार के छपरा और सिवान जिले के सीमा पर अवस्थित है जनता बाजार वहां लगभग 10 से 12000 बंगाल की नर्तकियों ने अपना स्थाई बसेरा बना लिया जो आर्केस्ट्रा ग्रुप में काम करके अपना और अपने परिवार का पालन पोषण करती भोजपुरी के जितने भी आइटम टाइप के गीत बनते हैं इन्हीं नर्तकियों को ध्यान में रखकर बनते हैं क्योंकि आर्केस्ट्रा ग्रुप में ही गीतों की सबसे ज्यादा डिमांड होती है और वहीं से गीत सबसे ज्यादा वायरल होते हैं।









