जब प्रतिपक्ष कमजोर हो जाए – लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा खतरा पैदा हो जाता है
डॉ. निरंजन ✒️
लोकतंत्र की शक्ति केवल चुनाव से नहीं आती, बल्कि उस संतुलन से आती है जो सत्ता और प्रतिपक्ष के बीच बना रहता है। जब संसद में मजबूत प्रतिपक्ष मौजूद होता है, तब सरकार के हर निर्णय की जांच होती है, नीतियों पर बहस होती है और जनता के हितों की रक्षा होती है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब किसी एक दल या नेतृत्व को अत्यधिक बहुमत मिल जाता है और प्रतिपक्ष लगभग समाप्त हो जाता है, तब लोकतंत्र का संतुलन टूटने लगता है। अराजकता जन्म लेता है।
विश्व राजनीति में इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। जर्मनी में हिटलर का उदय लोकतांत्रिक चुनावों के बाद ही हुआ था।1933 में संसद में भारी समर्थन मिलने के बाद उन्होंने धीरे-धीरे लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया और अंततः जर्मनी को तानाशाही शासन में बदल दिया।
परिणाम क्या हुआ लाखों लोगों की जान गई हिटलर ने Enabling act लगा कर पूरे देश के प्रतिपक्ष के नेता को जेल डाला या मरवा दिया।
इसी प्रकार सोवियत संघ में स्टालिन के समय सत्ता पूरी तरह एक व्यक्ति और एक पार्टी के हाथ में केंद्रित हो गई लाखोंलोगोंकी जान चली गई। विरोध की हर आवाज को कुचल दिया गया और लाखों लोगों को राजनीतिक दमन का सामना करना पड़ा।
इटली में 1924 में Banito Mussolini ने फासीवाद को जन्म दिया लाखों लोगों की जान गई पूरा तानाशाही शासन रहा।
दुनिया के अन्य हिस्सों में भी ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं। कंबोडिया में pol pot और khamer ruj की कट्टरपंथी नीतियों ने पूरे देश को जनसंहार की त्रासदी में धकेल दिया। युगांडा में ईदी अमीन के शासन ने भय और अराजकता का वातावरण पैदा कर दिया। लीबिया में गद्दाफी ने दशकों तक सत्ता को व्यक्तिगत नियंत्रण में रखा, जिसके परिणामस्वरूप संस्थाएँ कमजोर हो गईं और उनके पतन के बाद देश लंबे समय तक अस्थिरता में डूब गया।
इन उदाहरणों से एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है—जब सत्ता का संतुलन समाप्त हो जाता है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे व्यक्तिवाद और निरंकुशता की ओर बढ़ सकता है। संसद में यदि प्रतिपक्ष कमजोर हो जाए तो सरकार के निर्णयों पर प्रश्न उठाने वाला कोई नहीं रहता। कानून तेजी से पारित हो जाते हैं, संविधान में संशोधन आसान हो जाता है और प्रशासनिक संस्थाएँ राजनीतिक दबाव में आ सकती हैं। न्यायपालिका विधायिका का रखेल बन जाती है।
लेकिन यह भी सच है कि हर भारी बहुमत तानाशाही में नहीं बदलता। कुछ देशों में मजबूत संस्थाएँ लोकतंत्र को सुरक्षित रखती हैं। न्यायपालिका की स्वतंत्रता, मीडिया की सक्रियता और नागरिक समाज की जागरूकता लोकतंत्र के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है। यदि ये संस्थाएँ मजबूत रहें तो सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण भी संतुलित किया जा सकता है।
नेपाल जैसे लोकतंत्र के लिए यह एक महत्वपूर्ण समय हो सकता है। यदि नई राजनीतिक शक्तियाँ जनता के भरोसे पर खरा उतरती हैं, पारदर्शिता बनाए रखती हैं और संस्थाओं का सम्मान करती हैं, तो यह परिवर्तन देश के लिए सकारात्मक भी सिद्ध हो सकता है। लेकिन यदि अनुभव की कमी, जल्दबाजी में लिए गए निर्णय और बदले के भावना से काम किया जाए तो सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ता है, और राजनीतिक अस्थिरता और जनआंदोलन की संभावना भी पैदा हो सकती है।
अंततः लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल सरकार में नहीं बल्कि संतुलन में होती है। सत्ता और प्रतिपक्ष, दोनों मिलकर लोकतंत्र की दो धुरी बनाते हैं। जब इनमें से एक धुरी कमजोर पड़ जाती है, तब लोकतंत्र की गाड़ी असंतुलित हो जाती है। इसलिए किसी भी राष्ट्र के लिए यह आवश्यक है कि वह केवल चुनावी जीत को ही लोकतंत्र की सफलता न माने, बल्कि संस्थाओं की मजबूती, जवाबदेही और राजनीतिक संतुलन को भी उतना ही महत्व दे। जनता ने यदि आप पर भरोसा जताया है तो उस पर खरा उतरने की जिम्मेवारी आप की है, यदि आप पुराने गड़े मुर्दे उखाड़ने में लग जाएंगे तो देश का असली मुद्दा पीछे छुट जायगा और जनता ठगी महसूस करेगी फिर जनता में अविश्वास जन्म लेगा। जीत के जश्न में देश का असली समस्या न पीछे छुट जाए इसका भी खयाल करना चाहिए। शक्ति का यदि दुरुपयोग होने लगा तो वह लोकतंत्र को कमजोर कर देता है।
इतिहास बार-बार यही चेतावनी देता है—लोकतंत्र की रक्षा केवल मतपत्र से नहीं, बल्कि सतर्क समाज और मजबूत संस्थाओं से होती है।
परिवर्तन यदि जरूरी है तो विकास उससे ज्यादा जरूरी है।
लोकतंत्र के सभी सिपाहियों को नमन कर्ता हूँ।










