संघर्ष से शिक्षा मंत्री तक : मिथिलेश कुमार तिवारी की संगठन-पथ की यात्रा

एक कार्यकर्ता की चार दशकों की तपस्या की कहानी

संतोष राज पाण्डेय

बिहार की राजनीति में विरासतें अक्सर सुर्खियाँ बनती हैं, पर कुछ यात्राएँ विरासत से नहीं, श्रम से लिखी जाती हैं। बिहार के वर्तमान शिक्षा मंत्री मिथिलेश कुमार तिवारी की राजनीतिक कथा ऐसी ही एक यात्रा है। यह कहानी किसी परिवारवाद की परछाई, किसी राजनीतिक उत्तराधिकार या किसी की अनुकंपा की नहीं है। यह एक समर्पित कार्यकर्ता के चार दशक लंबे संघर्ष, अथक परिश्रम और संगठन के प्रति अटूट निष्ठा की कथा है। सड़क से संगठन तक और संगठन से सदन तक का उनका सफर इस शाश्वत सत्य का प्रमाण है कि राजनीति में लंबी पारी पद नहीं, परिश्रम तय करता है।

भारतीय जनता पार्टी में मिथिलेश तिवारी ने एक साधारण कार्यकर्ता के रूप में अपनी पहचान गढ़ी। क्रीड़ा प्रकोष्ठ जैसी जमीनी इकाई से लेकर संगठन की विविध और चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारियों तक, उन्होंने प्रत्येक दायित्व को साधना की तरह निभाया। उनकी पहचान किसी परिवार के नाम से नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता और संगठन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से बनी। बैकुंठपुर से विधायक निर्वाचित होने के पश्चात भी उनके व्यक्तित्व से कार्यकर्ता वाला सहज भाव तिरोहित नहीं हुआ। यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूँजी है।

शिक्षा मंत्री के रूप में उनकी कार्यशैली का सबसे उज्ज्वल पक्ष है – संवाद के लिए सदैव खुले द्वार। उनके पास पहुँचने वालों में केवल समर्थक या सत्तारूढ़ दल के लोग ही नहीं हैं। विपक्षी दलों के नेता, छात्र संगठन, शिक्षक संघ, शिक्षाविद, अभिभावक, सामाजिक कार्यकर्ता और आम जन भी अपनी व्यथा और अपेक्षाएँ लेकर उन तक पहुँचते हैं। उनकी कार्यपद्धति सरल है – पहले सुनना, फिर समाधान की दिशा में सोचना। वे प्रशासन को फाइलों से नहीं, संवाद से संचालित करने में विश्वास रखते हैं। चाहे शिक्षा व्यवस्था में सुधार के सुझाव हों, शिक्षकों की समस्याएँ हों या छात्रों की माँगें – वे संवाद को ही समाधान की प्रथम सीढ़ी मानते हैं।

उनकी राजनीतिक चेतना में तीन भूखंड एक साथ बसते हैं। बैकुंठपुर, जो उनकी विधानसभा है और उनके वर्तमान का आधार है; गोपालगंज, जो उनके जिले की पहचान और जन-सरोकारों का केंद्र है; और बक्सर, जो उनकी कर्मभूमि रही है। जिस धरती ने उन्हें पहचान दी, उससे उनका आत्मीय जुड़ाव आज भी वैसा ही है, और जहाँ उन्होंने संगठन को सींचा, वहाँ के विकास के प्रति उनकी चिंता आज भी उतनी ही सजीव है।

हाल ही में पथ निर्माण मंत्री के साथ उनकी बैठक की तस्वीर ने एक नए विमर्श को जन्म दिया है। चर्चा है कि बैकुंठपुर विधानसभा क्षेत्र में सड़क संपर्क को सुदृढ़ करने हेतु एक वृहद मेगा-प्लान आकार ले रहा है। सड़कें किसी भी क्षेत्र के विकास की प्रथम और अनिवार्य शर्त होती हैं। यदि यह योजना धरातल पर उतरती है, तो बैकुंठपुर के विकास को एक नई गति और नई दिशा मिलना अवश्यंभावी है।

मिथिलेश तिवारी को समझने के लिए उनके पद से अधिक उनकी यात्रा को देखना होगा। एक सामान्य कार्यकर्ता से विधायक और फिर बिहार के शिक्षा विभाग जैसे महत्वपूर्ण दायित्व तक पहुँचना उनके लिए केवल पद-प्राप्ति नहीं, अपितु वर्षों की संगठनात्मक तपस्या का प्रतिफल है।

सत्ता के शिखर पर पहुँचकर भी कार्यकर्ता बने रहना सबसे कठिन साधना है। मिथिलेश तिवारी ने इस साधना को सहजता से जिया है। संवाद, सहजता और सतत उपलब्धता – यही त्रिवेणी उन्हें भीड़ से अलग करती है। बिहार की शिक्षा व्यवस्था के समक्ष चुनौतियाँ बड़ी हैं, पर उनकी कार्यशैली यह संकेत देती है कि वे इन चुनौतियों का सामना बंद कमरों में नहीं, बल्कि समाज के साथ खड़े होकर, संवाद और सहभागिता के मार्ग से करने को तत्पर हैं।

अंततः राजनीति का शाश्वत सत्य यही है – परिवार का नाम आपको आरंभ दे सकता है, पर यात्रा का विस्तार तो आपका कर्म ही तय करता है। मिथिलेश तिवारी की कहानी इसी सत्य का जीवंत दस्तावेज है।

इस सफर को यहीं पर विराम देते हुए, इस यात्रा को दो प्रसिद्ध शायरों के अशआर से समेटना उचित होगा –

“खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले,
खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है।”
– अल्लामा इक़बाल

“मंजिलें उनको मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है,
पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।”

और अंत में –

“जो सफर की शुरुआत करते हैं, वो मंजिल को पार करते हैं,
बस एक बार चलने का हौसला रखो, तो सारे रास्ते खुद-ब-खुद बनते हैं।”


मिथिलेश तिवारी की कहानी केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस हर कार्यकर्ता की कहानी है जो बिना किसी पृष्ठभूमि के, अपने परिश्रम के बल पर अपना आकाश स्वयं गढ़ता है। जैसा कि शायर ने कहा है –

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है।

यह पंक्ति मिथिलेश तिवारी के चार दशक के राजनीतिक जीवन का सबसे सटीक सार है।

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