बीवाईडी प्रकरण: क्या कुछ कर्मचारियों को निलंबित कर देना ही समाधान है?

डॉ निरंजन


नेपाल में समय-समय पर बड़े भ्रष्टाचार, कर-छली और नीतिगत हेरफेर के मामले सामने आते रहे हैं। हर बार कुछ कर्मचारियों का तबादला, निलंबन या बर्खास्तगी होती है, जांच समिति बनती है, समाचारों में चर्चा होती है और फिर कुछ महीनों बाद मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ जाता है। यदि बीवाईडी गाड़ी आयात और कर-छली प्रकरण में भी यही दोहराया गया, तो यह केवल व्यक्तियों को दण्डित करने का प्रयास होगा, व्यवस्था को सुधारने का नहीं।ऐसे ही मामले और भी जगहों पर होता आया है कभी परीक्षा का प्रश्न पत्र परीक्षा से पहले बाजार में आ जाता है और कोई दोषी पकड़ा नहीं जाता। जाँच जिसका होना चाहिए उसका होता नहीं छोटे कर्मचारी को बलि का बकरा बना कर लीपा पोती कर दिया जाता है। इससे पहले भी ललिता निवास प्रकरण हुआ, मेलमची प्रकरण हुआ, कर छली का मामला, ऐसे कई मामले हुए लेकिन एक भी मुख्य दोषी पकड़ा नहीं गया और सजा नहीं हुआ आखिर क्यों? सरकार बदली है नौकरशाह नहीं बदले हैं। पूरा सिस्टम ही भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ है। ऐसा कौन क्षेत्र बचा हुआ है जो बेदाग हो? उदाहरण चीन का देते हैं लेकिन क्या आपको पता है चीन में भ्रष्टाचार का क्या सजा है? सीधा फांसी।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि बजट की गोपनीय जानकारी वास्तव में पहले से लीक हुई थी, तो वह एक व्यक्ति के कारण नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की विफलता का संकेत है। बजट निर्माण प्रक्रिया में सीमित व्यक्तियों को जानकारी उपलब्ध होती है। यदि कर दर परिवर्तन की सूचना पहले ही व्यापारिक समूह तक पहुँच गई, तो इसका अर्थ है कि संस्थागत गोपनीयता तंत्र कमजोर है। ऐसे में केवल कुछ कर्मचारी हटाकर समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा।
नेपाल की राजनीति का इतिहास भी यही बताता है। चाहे पंचायत काल हो, बहुदलीय व्यवस्था हो, राजतन्त्र हो या गणतन्त्र—लगभग हर सरकार ने भ्रष्टाचार विरोधी नारों के साथ सत्ता संभाली, लेकिन व्यवस्था में अपेक्षित सुधार नहीं कर सकी। कारण स्पष्ट है: समस्या व्यक्ति से अधिक प्रणाली में है। जब तक निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी और दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके विरुद्ध कार्रवाई नहीं होगी, तब तक सुधार अधूरा रहेगा।
इस प्रकरण का एक अन्य संवेदनशील पक्ष भी है। नेपाल में भारत, चीन और अन्य बाहरी शक्तियों से जुड़े विषय अक्सर राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाते हैं। कई लोगों का मानना है कि यदि यही विवाद किसी भारतीय कम्पनी या भारतीय व्यापारिक समूह से जुड़ा होता, तो राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और सामाजिक सञ्जाल कहीं अधिक मुखर दिखाई देते। दूसरी ओर, चीन से जुड़े मामलों में अपेक्षाकृत कम राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिलती है। यह धारणा सही हो या गलत, लेकिन यह स्वयं नेपाल की राजनीति के लिए चुनौती है। कानून और जांच की कसौटी कम्पनी की राष्ट्रीयता नहीं बल्कि तथ्य और प्रमाण होने चाहिए।
नेपाल जैसे छोटे और आयात-निर्भर देश के लिए राजस्व अत्यन्त महत्वपूर्ण है। देश की अर्थव्यवस्था पहले से ही प्रेषण (Remittance), विदेशी सहायता और सीमित औद्योगिक उत्पादन पर निर्भर है। ऐसे में यदि कर-छली या नीतिगत सेटिङका कारण राज्य को अरबों रुपये का नुकसान पहुँचता है, तो उसका सीधा असर विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा और आधारभूत संरचना पर पड़ता है। अन्ततः उसका भार आम नागरिक पर ही आता है।
यदि वर्तमान सरकार वास्तव में परिवर्तनकारी सरकार कहलाना चाहती है, तो उसे केवल निचले स्तर के कर्मचारी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की पूरी श्रृंखला की जांच करनी होगी। यह देखना होगा कि सूचना कहाँ से लीक हुई, किसे लाभ मिला, किस अधिकारी ने अनुमति दी, और किस स्तर पर निगरानी विफल रही। यदि जांच केवल कनिष्ठ कर्मचारियों तक सीमित रह गई, तो जनता के मन में यह धारणा और मजबूत होगी कि नेपाल में कानून कमजोर लोगों के लिए कठोर और शक्तिशाली लोगों के लिए नरम है।
इसलिए बीवाईडी प्रकरण केवल कर-छली का मामला नहीं है। यह नेपाल की प्रशासनिक पारदर्शिता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और सुशासन की परीक्षा है। जनता यह नहीं देख रही कि कितने कर्मचारी निलंबित हुए; जनता यह देख रही है कि क्या इस बार व्यवस्था बदलेगी या फिर इतिहास स्वयं को दोहराएगा।
अन्ततः किसी भी लोकतन्त्र की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वह अपने मित्रों और विरोधियों, देशी और विदेशी, सभी के लिए एक समान कानून लागू कर सकता है या नहीं। यह एक यक्ष प्रश्न है इसका जवाब तो देना ही होगा।
दोषी को सजा तो मिलना ही चाहिए और निर्दोष को नहीं फंसाया जाए।जब गंगोत्री में ही गंगा जल मैली हो जायगी तो ऋषिकेश में साफ नहीं किया जा सकता।

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