नेपाल की चिकित्सा शिक्षा: स्वर्णिम विरासत से गुणवत्ता संकट तक
✒️ डॉ निरंजन
नेपाल में आधुनिक चिकित्सा शिक्षा का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, लेकिन इसकी उपलब्धियाँ असाधारण रही हैं। आज देश में 23 मेडिकल कॉलेज संचालित हैं जहाँ प्रतिवर्ष लगभग 2,000 छात्र एमबीबीएस में प्रवेश लेते हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 749 विदेशी छात्र भी नेपाल में चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने आते हैं, जिनमें लगभग 99 प्रतिशत छात्र भारत से होते हैं। एक समय था जब नेपाल को दक्षिण एशिया में चिकित्सा शिक्षा का उभरता हुआ केंद्र माना जाता था। लेकिन आज वही प्रणाली गुणवत्ता, फैकल्टी संकट और शैक्षणिक मानकों को लेकर गंभीर प्रश्नों के घेरे में खड़ी है।
नेपाल में चिकित्सा शिक्षा की शुरुआत काठमांडू स्थित Institute of Medicine (IOM) से हुई। इसके बाद भारत सरकार के सहयोग से धरान में B.P. Koirala Institute of Health Sciences (BPKIHS) की स्थापना हुई। यह केवल एक संस्थान नहीं था, बल्कि भारत और नेपाल के शैक्षिक सहयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण था।
उस समय नेपाल में योग्य चिकित्सा शिक्षकों की संख्या सीमित थी। भारत के प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेजों से सेवानिवृत्त एवं अनुभवी MBBS, MD तथा MS चिकित्सक नेपाल आए और उन्होंने यहाँ चिकित्सा शिक्षा की मजबूत नींव रखी। अनेक भारतीय प्रोफेसरों ने दशकों तक ईमानदारी और समर्पण के साथ नेपाल के मेडिकल कॉलेजों में सेवा दी। उनके साथ भारत में प्रशिक्षित नेपाली चिकित्सकों ने भी मिलकर चिकित्सा शिक्षा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
1995 के बाद नेपाल में निजी मेडिकल कॉलेजों का तेजी से विस्तार हुआ। पोखरा, नेपालगंज, भरतपुर, काठमांडू, भैरहवा, वीरगंज, जनकपुर और विराटनगर सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों में मेडिकल कॉलेज स्थापित हुए। इससे देश में चिकित्सा शिक्षा का अवसर बढ़ा, लेकिन इसके साथ ही एक नई समस्या भी पैदा हुई—योग्य शिक्षकों की कमी।
विशेष रूप से Anatomy, Physiology, Biochemistry, Pharmacology, Microbiology, Forensic Medicine तथा अन्य बेसिक साइंस विषयों में विशेषज्ञ शिक्षकों का अभाव बढ़ता गया। नेपाल के अधिकांश युवा चिकित्सक क्लीनिकल विषयों की ओर आकर्षित हुए, जबकि बेसिक साइंस विषयों में करियर बनाने वालों की संख्या लगातार घटती गई।
इसी कमी को पूरा करने के लिए कुछ विश्वविद्यालयों ने BDS स्नातकों को इन विषयों में उच्च अध्ययन कर अध्यापन की अनुमति दी। आज कई मेडिकल कॉलेजों में बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षक कार्यरत हैं। यहाँ प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या वर्तमान व्यवस्था चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित कर पा रही है? क्या MBBS और MD छात्रों को पढ़ाने वाले सभी शिक्षक अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रशिक्षित हैं? क्या परीक्षाओं और मूल्यांकन की प्रक्रिया पर्याप्त रूप से पारदर्शी है? ये प्रश्न आज पहले से अधिक प्रासंगिक हो चुके हैं।
हाल ही में पहली बार नेपाल मेडिकल काउंसिल की लाइसेंसिंग परीक्षा का कॉलेजवार परिणाम सार्वजनिक हुआ। 1,200 से अधिक परीक्षार्थियों में केवल 76 प्रतिशत छात्र ही सफल हो सके। अर्थात प्रत्येक चार में से एक एमबीबीएस स्नातक न्यूनतम पेशेवर मानक तक नहीं पहुँच सका। यह केवल एक परीक्षा का परिणाम नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था के लिए चेतावनी का संकेत है।
स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब हम अन्य परिणामों को भी देखते हैं। भारत से एमबीबीएस कर नेपाल लौटे 26 नेपाली छात्रों में से केवल 11 सफल हुए जबकि 15 असफल रहे। दूसरी ओर नेपाल से एमबीबीएस कर भारत लौटे अनेक छात्रों का FMGE परिणाम भी अपेक्षाकृत कमजोर रहा है। स्पष्ट है कि समस्या केवल किसी एक कॉलेज या एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है। यह पूरी प्रणाली की गुणवत्ता से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
इस संकट की जड़ प्रवेश प्रणाली में भी दिखाई देती है।
नेपाल की Common Entrance Examination 200 अंकों की होती है और केवल 50 Percentile प्राप्त करने वाले छात्र भी योग्य घोषित हो जाते हैं। यदि 24,000 छात्र परीक्षा में शामिल होते हैं तो लगभग 12,000 छात्र योग्य घोषित कर दिए जाते हैं। ऐसी स्थिति में 180 अंक प्राप्त करने वाला छात्र और केवल 58 अंक प्राप्त करने वाला छात्र दोनों समान रूप से “Qualified” माने जाते हैं।
जब अंततः केवल लगभग 2,000 सीटें उपलब्ध हों और प्रवेश का आधार काफी हद तक आर्थिक क्षमता बन जाए, तब स्वाभाविक रूप से बहुत उच्च स्तर के छात्रों के साथ-साथ बहुत कमजोर शैक्षणिक आधार वाले छात्र भी चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश प्राप्त कर लेते हैं। इसका प्रभाव आगे चलकर कक्षा, विश्वविद्यालय परीक्षा, लाइसेंसिंग परीक्षा और अंततः चिकित्सा सेवा की गुणवत्ता पर पड़ता है।
भारत में भी कुछ हद तक यही स्थिति देखने को मिलती है। NEET परीक्षा में लाखों छात्र भाग लेते हैं। न्यूनतम कट-ऑफ पार करने वाले अनेक छात्र सरकारी सीट प्राप्त नहीं कर पाते। उनमें से कई विदेशों का रुख करते हैं या महंगे निजी संस्थानों में प्रवेश लेते हैं। नेपाल आने वाले विदेशी छात्रों का बड़ा हिस्सा भी इसी वर्ग से आता है। परिणामस्वरूप छात्रों के शैक्षणिक स्तर में भारी अंतर दिखाई देता है।
आज आवश्यकता दोषारोपण की नहीं, बल्कि गंभीर आत्ममंथन की है।
नेपाल को चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में कुछ साहसिक सुधारों पर विचार करना चाहिए।
सबसे पहले, केवल Percentile आधारित पात्रता पर्याप्त नहीं है। चिकित्सा शिक्षा के लिए न्यूनतम अंक की अनिवार्य सीमा निर्धारित की जानी चाहिए। उदाहरण के लिए 200 में 100 से कम अंक प्राप्त करने वाले छात्र को एमबीबीएस में प्रवेश के लिए अयोग्य माना जा सकता है।
दूसरे, नेपाल में अध्ययन करने वाले विदेशी छात्रों के लिए भी समान शैक्षणिक मानक लागू होने चाहिए। केवल NEET पास कर लेना पर्याप्त न हो; उन्हें नेपाल की संयुक्त प्रवेश परीक्षा या उसके समकक्ष किसी अकादमिक मूल्यांकन से भी गुजरना चाहिए।
तीसरे, सभी मेडिकल कॉलेजों में बेसिक साइंस तथा क्लीनिकल विषयों के शिक्षकों का स्वतंत्र शैक्षणिक ऑडिट होना चाहिए। उनकी योग्यता, शोध कार्य, अध्यापन क्षमता और छात्रों के परिणामों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
चौथे, यह भी समीक्षा का विषय होना चाहिए कि विभिन्न विषयों में अध्यापन और परीक्षा लेने के लिए न्यूनतम योग्यता क्या होनी चाहिए। चिकित्सा शिक्षा में गुणवत्ता से समझौता किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
पाँचवें, यदि देश में पर्याप्त योग्य फैकल्टी उपलब्ध नहीं हैं तो नेपाल को पुनः अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुभवी शिक्षकों को आकर्षित करने की नीति बनानी चाहिए। जिन भारतीय और विदेशी प्रोफेसरों ने कभी नेपाल की चिकित्सा शिक्षा की नींव मजबूत की थी, उनके अनुभव का लाभ पुनः लिया जा सकता है।
चिकित्सा शिक्षा कोई सामान्य व्यवसाय नहीं है। यह भविष्य के चिकित्सकों को तैयार करती है और वही चिकित्सक भविष्य में लाखों लोगों के जीवन की जिम्मेदारी संभालते हैं। यदि प्रवेश में समझौता होगा, अध्यापन में समझौता होगा और मूल्यांकन में समझौता होगा, तो उसका परिणाम अंततः आम जनता को भुगतना पड़ेगा।
नेपाल ने चिकित्सा शिक्षा का विस्तार कर एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। अब आवश्यकता विस्तार की नहीं, बल्कि गुणवत्ता की पुनर्स्थापना की है। मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाना आसान है, लेकिन उत्कृष्ट चिकित्सक तैयार करना कठिन है। यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए तो डिग्रियों की संख्या बढ़ती रहेगी, लेकिन गुणवत्ता और विश्वास दोनों कमजोर होते जाएंगे।
नेपाल की चिकित्सा शिक्षा आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। अब यह तय करना देश की सरकार, विश्वविद्यालयों, चिकित्सा शिक्षा आयोग और नेपाल मेडिकल काउंसिल के हाथ में है कि आने वाले वर्षों में नेपाल केवल डिग्री देने वाला देश बनेगा या उत्कृष्ट चिकित्सक तैयार करने वाला राष्ट्र।









