ब्यूरो रिपोर्ट, पटना
बाँकीपुर विधानसभा सीट पर गुरुवार को मतदान शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया। हालांकि इस बार मतदाताओं का उत्साह काफी फीका रहा। सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक सिर्फ 34.30 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। यह प्रतिशत कम जरूर है, लेकिन बाँकीपुर सीट के चुनावी इतिहास को देखें तो यह कोई असामान्य स्थिति नहीं है। वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में यहाँ 40.97 प्रतिशत, 2020 में 35.92 प्रतिशत, 2015 में 40.25 प्रतिशत और 2010 में 36.96 प्रतिशत मतदान हुआ था। यानी इस सीट पर वर्षों से मतदान का प्रतिशत अपेक्षाकृत कम ही रहा है।
कम मतदान के बावजूद पिछले चार विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने इस सीट पर लगातार शानदार प्रदर्शन किया है। बीजेपी के नितिन नवीन को हर चुनाव में कुल मतदान का लगभग 50 से 72 प्रतिशत तक वोट मिला और उन्होंने लगातार जीत दर्ज की। वर्ष 2025 में उन्होंने आरजेडी की रेखा गुप्ता को लगभग 51 हजार वोटों से हराया था। 2020 में कांग्रेस के लव सिन्हा को 39,036 वोट (27.75 प्रतिशत) के अंतर से पराजित किया, जबकि 2015 में कांग्रेस के कुमार आशीष को 39,767 वोट (करीब 27.59 प्रतिशत) से हराया था। 2010 में आरजेडी के विनोद श्रीवास्तव को 60,840 वोट (55.66 प्रतिशत) के भारी अंतर से शिकस्त दी थी।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि बीजेपी का इस सीट पर मजबूत सामाजिक और राजनीतिक आधार रहा है। पिछले चार चुनावों में पार्टी को 50 प्रतिशत से अधिक वोट मिले, जबकि उसके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी 30 से 35 प्रतिशत वोटों के बीच ही सीमित रहे। इसकी बड़ी वजह बाँकीपुर का जातीय समीकरण भी है। यहाँ करीब 15 प्रतिशत से अधिक कायस्थ मतदाता हैं, जो परंपरागत रूप से बीजेपी के साथ माने जाते हैं। इसके अलावा ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत मिलाकर लगभग 20 प्रतिशत, जबकि वैश्य मतदाता करीब 12 प्रतिशत हैं। यही सामाजिक समीकरण बीजेपी की लगातार जीत का प्रमुख आधार रहा है।
हालांकि इस बार का उपचुनाव पिछले चुनावों से अलग रहा। पहली बार मुकाबला पूरी तरह त्रिकोणीय नजर आया। जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की उम्मीदवारी ने चुनाव को नई दिशा दी। उन्होंने न सिर्फ बीजेपी के पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक—ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत—में सेंध लगाने की कोशिश की, बल्कि आरजेडी के परंपरागत मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण को भी चुनौती दी। चुनाव प्रचार के दौरान मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग जनसुराज की ओर झुकता दिखाई दिया। हालांकि यादव मतदाताओं का रुझान अधिकांशतः आरजेडी के पक्ष में ही बना रहा।
चुनाव की एक अहम बात यह भी रही कि प्रशांत किशोर की जीत या हार काफी हद तक आरजेडी के प्रदर्शन पर निर्भर करती दिख रही है। यदि आरजेडी अपने परंपरागत मुस्लिम-यादव वोट बैंक को पूरी तरह अपने साथ बनाए रखने में सफल रहती है, तो इसका सीधा नुकसान जनसुराज को होगा। मतदान से पहले मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव जनसुराज की ओर माना जा रहा था, लेकिन मतदान से ठीक पहले तेजस्वी यादव के रोड शो के बाद मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा फिर आरजेडी की ओर लौटता दिखा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेजस्वी यादव के शुरुआती दौर में प्रचार से दूरी बनाए रखने के कारण कुछ मतदाताओं में यह भ्रम था कि महागठबंधन का अप्रत्यक्ष समर्थन प्रशांत किशोर को प्राप्त है। हालांकि मुस्लिम युवाओं का एक वर्ग अंत तक जनसुराज के साथ दिखाई दिया।
फिलहाल सभी की निगाहें 3 अगस्त को आने वाले चुनाव परिणाम पर टिकी हैं। लेकिन मतदान प्रतिशत के रुझान और बाँकीपुर के पिछले चुनावी इतिहास को देखते हुए इतना जरूर कहा जा सकता है कि कम मतदान का असर बीजेपी की तुलना में आरजेडी और जनसुराज पर अधिक पड़ सकता है। कम वोटिंग परंपरागत रूप से बीजेपी के संगठित वोट बैंक के लिए अनुकूल मानी जाती रही है। हालांकि इस बार त्रिकोणीय मुकाबले ने समीकरण बदले हैं, इसलिए अंतिम फैसला अब मतगणना के दिन ही होगा।







