संतोष राज पाण्डेय
बनारस दुनिया का इकलौता ऐसा शहर है जहाँ यमराज भी आने से पहले अपनी जनम-पत्री चेक करते हैं। यहाँ मोक्ष थोक के भाव मिलता है, और ज्ञान… ज्ञान तो यहाँ की नालियों में बहता है। इसी पावन नगरी के अस्सी घाट पर हमारे नायक, पिंटू तिवारी बैठे थे। पिंटू खुद को ‘तीरथ-यात्री सलाहकार’ कहते थे, पर बही-खाते में उनका पेशा ‘बेरोजगार’ दर्ज था।

पिंटू के हाथ में मिट्टी का कुल्हड़ था। वह सामने गंगा जी को ऐसे देख रहे थे जैसे गंगा जी ने उनका पांच हजार रुपया उधार मार लिया हो। तभी वहाँ एक गोरा सात-समुंदर पार का सैलानी आया। कंधे पर भारी झोला टांगे।
“एक्सक्यूज मी, कैन यू टेल मी द हिस्ट्री ऑफ दिस घाट?” विदेशी ने अंग्रेजी में पूछा।
पिंटू ने अपनी बनारसी बुद्धि का लाउडस्पीकर ऑन किया। “लुक ब्रदर, दिस इज अस्सी घाट। हियर अस्सी ऋषिस डीड तपस्या। सो इट्स अस्सी। इफ 90 ऋषिस डीड, इट वुड बी नब्बे घाट। सिंपल मैथ, नो कन्फ्यूजन!”
विदेशी हैरान होकर कागज-कलम से नोटपैड में लिखने लगा। पिंटू ने आगे बढ़ाया, “एंड सी दैट बाबा? ही इज लिविंग विदाउट ऑक्सीजन सिंस 1947। ओनली ऑन गंगा जल एंड गांजा।”
विदेशी ने श्रद्धा से हाथ जोड़े और पिंटू को पाँच सौ का नोट थमा दिया। इसे बनारस में ‘ज्ञान टैक्स’ कहते हैं। यहाँ इतिहास बनता नहीं है, हर सुबह चाय की दुकान पर नया इतिहास छापा जाता है।
बनारस में अगर आप किसी से रास्ता पूछेंगे, तो वह सीधे नहीं बताएगा। वह पहले आपसे पूछेगा, “कहाँ जाना है? काहे जाना है? उनके मौसा तो हमारे साढ़ू के भाई हैं।”
पिंटू शाम को पप्पू की अड़ी (चाय की दुकान) पर पहुँचे। यहाँ का नियम है: चाय पाँच की, राजनीति पचास की। दुकान पर बैठे थे गुरुजी, जो पिछले चालीस साल से सरकारी परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। अब उनकी उम्र इतनी हो चुकी थी कि खुद देश का कानून उनके सामने छोटा लग रहा था।
“पिंटू! का हो? आज फिर कौनों मेम को लपेट दिए?” गुरुजी ने खैनी ठोकते हुए पूछा।
“गुरुजी, ज्ञान बांटना पुण्य का काम है। हम तो बस देश की तरक्की बढ़ा रहे हैं,” पिंटू ने मूंछों पर ताव दिया।
तभी वहाँ बनारस के सबसे बड़े ‘नेता जी’ आ गए। नेता जी का खद्दर का कुर्ता इतना सफेद था कि उसे देखकर वाशिंग पाउडर की कंपनियां आत्महत्या कर लें। नेता जी बोले, “इस बार चुनाव में हम अस्सी घाट पर छत लगवा देंगे। जनता धूप से त्रस्त है।”
दुकान के कोने से एक बुड्ढे बाबा चिल्लाए, “अबे नेता! पहले चौक की सड़क का गड्ढा भरो। कल उसमें एक सांड गिरा था, आज सुबह वो सांड वीआईपी वीआईपी चिल्लाता हुआ निकला है!”
पूरी दुकान ठहाकों से गूंज उठी। बनारस में सांड और नेता, दोनों को रास्ता देना पड़ता है। सांड सींग मारता है, और नेता सीधे जेब।
बनारस की सबसे खास बात यह है कि यहाँ जिंदगी और मौत के बीच की दूरी सिर्फ एक कुल्हड़ चाय की है। पिंटू अपने एक दोस्त कल्लु के साथ मणिकर्णिका घाट की तरफ टहलने गए। वहाँ चौबीसों घंटे चिताएं जलती हैं। लोग दूर-दूर से मोक्ष देखने आते हैं।
वहाँ एक परिवार रो रहा था। पिंटू ने जाकर सांत्वना दी, “काहे रो रहे हैं भाई साहब? बाबूजी तो सीधे बैकुंठ गए। यहाँ तो साक्षात शिव जी कान में तारक मंत्र फूंकते हैं।”
तभी रोने वाले परिवार का एक आदमी बोला, “अरे भाई, बाबूजी के मरने का दुख नहीं है। दुख इस बात का है कि बाबूजी जमींदारी की फाइल अलमारी में ताला मार के चले गए और चाबी उनके पाकेट में ही रह गई, जो अब जल रही है!”
पिंटू ने माथा पीट लिया। यह सिर्फ बनारस में हो सकता है कि श्मशान घाट पर भी लोग प्रॉपर्टी का मुकदमा लड़ने की प्लानिंग कर रहे हों। यहाँ वैराग्य भी बिकाऊ है और माया भी अमर है।
अगले दिन पिंटू अपनी खटारा पुरानी साइकिल लेकर गोदौलिया चौराहे की तरफ निकले। गोदौलिया यानी कलयुग का वह नरक जहाँ यमराज भी अपनी भैंसा गाड़ी खड़ी करने से डरते हैं। वहाँ की सड़कों पर पैदल चलने वालों की भी कोई परवाह नहीं होती।
तभी सड़क के बीचों-बीच दो विशाल सांड लड़ने लगे। एक का नाम था ‘कालिया’ और दूसरे का ‘सुलतान’। दोनों में बनारस का असली ‘अहंकार’ था।
सड़क जाम हो गई। पीछे से तांगे वालों और रिक्शे वालों की ऐसी आवाज आ रही थी जैसे कोई नौटंकी बज रही हो। एक इक्के वाले ने चिल्लाकर कहा, “ए भाई! सांड लोग! थोड़ा साइड होकर लड़ो। हमको सवारी छोड़ना है।”
कालिया सांड ने इक्के वाले को ऐसी नजर से देखा जैसे कह रहा हो, “दुकान बंद कर, पहले हमारा लाइव मैच देख।”
पिंटू ने चालाकी दिखाई। उन्होंने अपनी साइकिल सांडों के बगल से निकालने की कोशिश की। तभी सुलतान ने अपनी पूंछ घुमाई और वह सीधे पिंटू के चेहरे पर लगी। पिंटू साइकिल समेत बगल की कचौड़ी की दुकान की जलती हुई कढ़ाई के पास जा गिरे।
दुकानदार चिल्लाया, “अरे पिंटू भाई! गिरे तो गिरे, कम से कम दो समोसा ही लेते जाइए!”
शाम को चोटिल पिंटू बाबा विश्वनाथ के मंदिर पहुँचे। बनारस का नियम है—सुबह चाहे जितनी बकैती करो, शाम को बाबा के चरणों में हाजिरी लगानी ही पड़ती है। मंदिर के बाहर लंबी कड़वा तेल और फूल-माला की दुकानें थीं।
एक पंडा जी ने पिंटू को लपेटा, “आओ जजमान! वीआईपी दर्शन करा देंगे। सिर्फ ग्यारह सौ रुपया लगेगा। सीधे गर्भगृह में एंट्री!”
पिंटू बोले, “बाबा, हम बनारसी हैं। हम वीआईपी नहीं, हम तो बाबा के ‘लोकल गुंडे’ हैं। बाबा हमको बिना लाइन के पहचानते हैं।”
पिंटू लाइन में लग गए। धक्का-मुक्की का वह आलम था कि पिंटू घुसे सीधे थे, पर जब बाहर निकले तो उनकी चप्पल गायब थी और कुर्ता पीछे से फट चुका था। लेकिन चेहरे पर वही बनारसी संतोष था।
उन्होंने आसमान की तरफ देखा और कहा, “वाह बाबा! मोक्ष मिले न मिले, पर आपकी इस भीड़ में मुफ़्त का शरीर का मालिश जरूर मिल जाता है।”
अगली सुबह, पिंटू फिर से अस्सी घाट पर थे। सुबह-ए-बनारस का सूरज धीरे-धीरे गंगा की लहरों पर अपनी लालिमा बिखेर रहा था। पंडित लोग शंख बजा रहे थे, और कुछ विदेशी योग की ऐसी मुद्राएं बना रहे थे जिन्हें देखकर पतंजलि भी शरमा जाएं।
पिंटू ने एक बार फिर अपनी चाय की चुस्की ली। उनके पास कल के चोट के निशान थे, चप्पल खो चुकी थी, जेब खाली थी, लेकिन उनके चेहरे का सुकून किसी राजा जैसा था।
बनारस का यही सच है। यहाँ लोगों की जिंदगी में ‘धीमापन’ हमेशा लगा रहता है। यहाँ हर आदमी फक्कड़ है, हर आदमी राजा है। यहाँ चिंता को ‘चिता’ समझा जाता है और आनंद को ‘महादेव’।
अस्सी घाट पर सुबह की चाय अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि पिंटू की किस्मत का ताला दोबारा खुला। सामने से वही विदेशी सैलानी आ रही थी। उसका नाम था जेन। जेन अमेरिका के किसी बड़े। विश्वविद्यालय से ‘भारतीय संस्कृति और मोक्ष’ पर रिसर्च करने बनारस आई थी। दिक्कत बस यह थी कि उसे मोक्ष तो चाहिए था, पर बनारस के सांडों से डर लगता था।
“हाय पिंटू!” जेन ने अपनी टूटी-फूटी हिंदी में कहा, “मुझे मणिकर्णिका का इतिहास और गहराई से जानना है। क्या तुम मेरी हेल्प करोगे?”
पिंटू ने अपने फटे हुए कुर्ते को थोड़ा संभाला, मूंछों पर ताव दिया और बोले, “यस मेम! व्हाई नॉट? पिंटू तिवारी इज ऑलवेज रेडी फॉर इंटरनेशनल पीस (शांति)। तुम चिंता मत करो, हमारे रहते सांड तो क्या, यमराज भी तुमको टच नहीं कर सकते।”
पिंटू ने तुरंत कल्लु को आवाज़ दी, “अबे कल्लु, जल्दी से अपना तांगा लेकर अस्सी घाट आ। आज इंटरनेशनल डील फाइनल करनी है। और हाँ, जरा तमीज के कपड़े पहन कर आना।”
कल्लु जब आया, तो उसने धोती के ऊपर सूती कुर्ता पहन रखा था। बनारस में जो पहन लो, वही ट्रेंड बन जाता है। जेन तांगे के बीच में बैठ गई, पिंटू आगे और कल्लु पीछे। तांगे की सवारी और बनारस की गलियां—यह कॉम्बिनेशन सीधे भगवान से मिलने का टिकट होता है।
जेन को असली बनारस देखना था, इसलिए पिंटू उसे सोनारपुरा की एक तंग गली में ले गया, जहाँ ‘तांत्रिक तोताराम’ का ठिकाना था। तोताराम जी के कमरे में इतनी अगरबत्ती जल रही थी कि आसमान के बादल भी वहाँ का धुआं देखकर चकरा जाएं। उनके गले में हड्डियों की माला थी और हाथ में एक काला असली कौआ था।
“आओ माई! तुम्हारी कुंडली में भयंकर राहु बैठा है,” तोताराम ने जेन को देखते ही अपनी आंखें बड़ी-बड़ी कीं।
पिंटू ने धीरे से कान में कहा, “गुरुजी, यह अमेरिका से आई है। इसके पास राहु नहीं, डॉलर है। थोड़ा ढंग का मंत्र मारिए।”
तोताराम ने तुरंत गियर बदला। उन्होंने एक नींबू निकाला, उस पर सिंदूर लगाया और जेन के सिर के ऊपर सात बार घुमाया। फिर बोले, “लुक मेम! योर पास्ट लाइफ वाज वेरी बैड। यू वर अ कैट इन बनारस इन योर प्रीवियस बर्थ। (तुम पिछले जन्म में बनारस की बिल्ली थी)।”
जेन बहुत भावुक हो गई, “ओह माय गॉड! रियली? इसीलिए मुझे दूध बहुत पसंद है!”
पिंटू और कल्लु ने अपनी हंसी रोकने के लिए अपने गाल काट लिए। तोताराम ने मोक्ष की स्पेशल पुड़िया जेन को दी और बदले में ‘दक्षिणा’ के रूप में सौ डॉलर का नोट अपनी जटाओं में खोंस लिया। बनारस में अंधविश्वास भी एक धंधा है, जिसकी फंडिंग सीधे विदेशी सैलानी करते हैं।
तांत्रिक के यहाँ से निकलकर जेन को भूख लगी। अब बनारस आए और ‘रामभंडार’ की कचौड़ी-सब्जी और जलेबी न खाई, तो आपका जीवन ही व्यर्थ है। लेकिन वहाँ पहुँचने के लिए गोदौलिया चौराहे की उस ‘अग्निपरीक्षा’ से गुजरना था जिसे स्थानीय लोग ‘महा-जाम’ कहते हैं।
सड़क पर एक तरफ से मुर्दा घाट की तरफ जा रही शवयात्रा थी, दूसरी तरफ से एक नेता जी का कतारबद्ध काफिला, तीसरी तरफ से शादी की बारात जिसमें दूल्हा घोड़े पर बैठा पसीने से तरबतर था, और चौथी तरफ कचरा उठाने वाला हाथ-ठेला फंसा था।
नेता जी के समर्थक चिल्ला रहे थे, “हमारे नेता कैसे हों? साक्षात भगवान जैसे हों!”
तभी शवयात्रा वाले चिल्लाए, “राम नाम सत्य है!”
बारात वाले ढोल-नगाड़ों पर पारंपरिक धुन बजा रहे थे।
इस त्रिवेणी संगम को देखकर जेन का सिर चकरा गया। उसने पिंटू से पूछा, “पिंटू, यह क्या हो रहा है? इज दिस अ फेस्टिवल?”
पिंटू ने गंभीर होकर कहा, “मेम, दिस इज कॉल्ड ‘द सर्कल ऑफ लाइफ’। यहाँ जन्म (बारात), कर्म (नेताजी) और मरण (शवयात्रा) सब एक ही चौराहे पर मिलते हैं। इसी को तो सनातन सत्य कहते हैं।”
जेन मंत्रमुग्ध हो गई। इसी बीच कल्लु ने भीड़ का फायदा उठाकर चार प्लेट कचौड़ी और गरम-गरम जलेबी का जुगाड़ कर लिया। कचौड़ी खाते ही जेन की आंखों से आंसू निकल आए—मिर्च के मारे नहीं, बल्कि उस स्वाद के आनंद में।
शाम होते-होते पूरी पलटन दशाश्वमेध घाट पहुँची। शाम की गंगा आरती बनारस का वह भव्य नजारा है जहाँ जगह पाने के लिए लोग दोपहर तीन बजे से ही घाट की सीढ़ियों पर सूती अंगोछा बिछाकर बैठ जाते हैं। घाट पर लाखों की भीड़ थी। हर आँख सिर्फ सामने हो रही दिव्य हलचल को निहार रही थी।
पिंटू ने जेन के लिए एक लकड़ी की नाव (बोट) बुक की। नाव वाले ने किराया माँगा बहुत ज्यादा, पर पिंटू ने अपनी बनारसी मोल-भाव की कला दिखाई, “ए भाई! हम चेतगंज के तिवारी हैं। रोज़ यहीं बैठते हैं। सही दाम लो और चुपचाप पतवार चलाओ।” मामला सही दाम में सेट हुआ।
आरती शुरू हुई। बड़े-बड़े पीतल के दीयों की रोशनी, शंखों की गूंज और डमरू की आवाज से पूरा माहौल अलौकिक हो गया। जेन पूरी तरह भक्ति में लीन हो चुकी थी। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं।
तभी बगल की नाव से एक मोटे अंकल जी चिल्लाए, “अरे पिंटू! ज़रा हटना भाई, तुम्हारी मेम के चक्कर में हमारा सामने का नजारा खराब हो रहा है! पीछे बैठे लोग देख नहीं पा रहे हैं!”
पिंटू ने चिल्लाकर जवाब दिया, “अंकल जी, भक्ति पर ध्यान दीजिए, इधर-उधर नहीं! महादेव सब देख रहे हैं।”
बनारस में लोग भगवान की आरती देखते हुए भी आस-पास की दुनिया का आनंद लेना नहीं भूलते।
रात के ग्यारह बज चुके थे। घाट खाली हो रहे थे, पर पप्पू की अड़ी पर अभी भी चौपाल चल रही थी। कल्लु और पिंटू, जेन को लेकर वहाँ पहुँचे। गुरुजी अपनी खैनी का आखिरी दौर चला रहे थे।
जेन ने गुरुजी से पूछा, “सर, मैंने पूरा बनारस देखा। यहाँ बहुत गंदगी है, बहुत भीड़ है, बहुत शोर है… फिर भी यहाँ के लोगों के चेहरे पर इतना सुकून क्यों है?”
गुरुजी ने अपनी चश्मा नाक पर टिकाया और बोले, “बिटिया! बनारस कोई शहर नहीं है, यह एक मनःस्थिति है। दुनिया के लोग कल की चिंता में आज मर रहे हैं। और बनारसी? वह आज की चाय में कल का मोक्ष ढूंढ लेता है। यहाँ अमीर और गरीब का अंतर तब खत्म हो जाता है जब दोनों एक ही घाट पर, एक ही मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पीते हैं। यहाँ का सांड भी जानता है कि उसे कब हटना है और कब अड़ना है। यह शहर सिखाता है कि जो आया है, उसे जाना ही है; तो फिर जिंदगी को भारी काहे लेना?”
जेन गुरुजी की बातें सुनकर भावुक हो गई। उसने हाथ जोड़कर कहा, “थैंक यू पिंटू। तुमने मुझे वो बनारस दिखाया जो किसी किताब में नहीं है।”
अगले दिन जेन वापस अपने देश चली गई। पिंटू के पास कुछ यादें बची थीं। वह फिर से अस्सी घाट की उसी सीढ़ी पर बैठा था। सुबह का सूरज फिर से गंगा में नहाकर निकल रहा था।
कल्लु दौड़ता हुआ आया, “का हो पिंटू भाई! मेम तो चली गई। अब आगे का क्या प्लान है? तीरथ-यात्री सलाहकार की दुकान बंद?”
पिंटू ने चाय का कुल्हड़ उठाया, एक लंबी चुस्की ली और मुस्कुराकर बोले, “अबे कल्लु, बनारस कभी खाली नहीं होता। एक मेम गई तो क्या हुआ, अभी कल ही तो लंका चौराहे पर तीन सुदूर पूर्व के यात्री मिले हैं, जो रास्ता भटक गए थे। उनको मैंने बता दिया है कि सारनाथ जाने का रास्ता मणिकर्णिका से होकर जाता है!”
दोनों ज़ोर से हंस पड़े। बनारस की सुबह फिर से शुरू हो चुकी थी। यहाँ न तो कहानियों का अंत होता है, और न ही बकैती का। यहाँ हर सुबह एक नया अध्याय है, और हर शाम एक नई मुक्ति।
सड़क पर एक सांड मटकते हुए निकला, दूर किसी कोने से कजरी बज रही थी, और पिंटू तिवारी एक बार फिर नए राहगीर की तलाश में अपनी चप्पल घिसते हुए आगे बढ़ गए।
“बोलिए राजा… हर हर महादेव…❤️🌻







