बनारस की गलियों में जब तक एक-आध बार सांड आपको रास्ता खाली करने के लिए न कह दे, तब तक आपका बनारस आना अधूरा माना जाता है

संतोष राज पांडेय

बनारस की गलियों में जब तक एक-आध बार सांड आपको रास्ता खाली करने के लिए न कह दे, तब तक आपका बनारस आना अधूरा माना जाता है। लेकिन हमारी कहानी के नायक, डॉक्टर मैक्सवेल उर्फ ‘मैक्स भाई’ को यह बात समझने में पूरे तीन हफ्ते लग गए।

मैक्स भाई अमेरिका की किसी बड़ी यूनिवर्सिटी से भारतीय संस्कृति के अध्ययन में शोध कर रहे थे। उनका विषय बड़ा गंभीर था: “बनारस के घाटों पर होने वाली सुबह की आरती का वैश्विक चेतना पर प्रभाव।” लेकिन बनारस में पैर रखते ही उनकी वैश्विक चेतना का जो कचरा हुआ, वही हमारी इस कहानी की असली गहराई है।

मैक्स भाई छह फीट दो इंच लंबे, गोरे-चिट्टे, और चेहरे पर एक अजीब सा ‘ज्ञान की तलाश’ वाला भाव लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लंका गेट पर उतरे। कंधे पर तीन लाख का कैमरा और हाथ में विदेशी सैलानियों वाली गाइड बुक। उन्हें लगा था कि वो बुद्ध की तरह यहाँ आकर तुरंत ज्ञान खोज लेंगे।

उन्हें सबसे पहले मिले पप्पू चाय वाले। मैक्स ने अपनी टूटी-फूटी हिंदी में पूछा, “क्षमा कीजिये, क्या मुझे मोक्ष का रास्ता मिल सकता है?”

पप्पू ने खौलती हुई चाय को कुल्हड़ में डालते हुए कहा, “काहे नहीं गुरु! सामने वाली गली से दाहिने मुड़ना, फिर बाएं। वहीं बंगाली टोला में बाबा मोक्षानंद मिलेंगे। लेकिन पहले ये अदरक वाली चाय मारो, खोपड़ी एकदम झनझना जाएगी।”

मैक्स ने कुल्हड़ पकड़ा। उन्हें लगा कि यह मिट्टी का बर्तन पर्यावरण के अनुकूल है, बहुत गहरा दर्शन है। उन्होंने एक घूंट लिया और बोले, “ओह! यह तो साक्षात देवतुल्य है!” तभी पीछे से एक बनारसी ने उनके कंधे पर हाथ रखा और बोला, “अरे छोड़ो साहेब, यह तो बस शुरुआत है। अभी आगे-आगे देखो होता है क्या।”

मैक्स भाई ने किताबों में पढ़ा था कि बनारस में समय ठहर जाता है। जब वो गोदौलिया चौराहे पर पहुंचे, तो उन्हें समझ आया कि समय नहीं ठहरता, बस गाड़ियां ठहर जाती हैं। एक तरफ से ऑटो, दूसरी तरफ से रिक्शा, बीच में एक बाबा साइकिल पर प्रभु का नाम जपते हुए, और इन सबके बीच में एक सफेद रंग की गाय पूरी दुनिया से बेखबर जुगाली कर रही थी।

मैक्स ने अपना कैमरा निकाला और इस व्यवस्था के बीच बैठी अराजकता की फोटो खींचने लगे। तभी एक रिक्शे वाले ने जोर से घंटी बजाई, “ऐ साहेब! हटो सामने से, नहीं तो मोक्ष यहीं मिल जाएगा!”

मैक्स डरकर पीछे हटे, तो उनका पैर सीधे एक ताजे गोबर पर पड़ा। मैक्स चिल्लाए, “ओह धिक्कार है!”

पास खड़े एक बनारसी ने पान की पीक थूकते हुए कहा, “धिक्कार नहीं गुरु, यह गोबर है। लक्ष्मी जी का वास होता है इसमें। आज आपका दिन बढ़िया जाएगा।” मैक्स भाई ने तुरंत अपनी डायरी निकाल कर लिखा: “बनारस में गंदगी को भी एक दिव्य दृष्टिकोण से देखा जाता है। यहाँ के लोग हर परिस्थिति में सकारात्मकता ढूंढ लेते हैं।”

सिर का दर्द अभी थमा नहीं था कि उनके मकान मालिक मिश्रा जी अगली सुबह उन्हें घसीटते हुए गोदौलिया की एक मशहूर कचौड़ी गली में ले आए। सुबह के सात बज रहे थे, लेकिन गली में इतनी भीड़ थी जैसे वहाँ कोई खजाना बंट रहा हो। हवा में शुद्ध देसी घी की खुशबू तैर रही थी।

मैक्स भाई ने जेब से हाथ साफ करने वाली दवा निकाली, तो मिश्रा जी ने उनका हाथ पकड़ लिया, “अरे साहेब! यह सब विदेशी नौटंकी यहाँ नहीं चलेगी। यहाँ का नियम है—जितना कीटाणु अंदर जाएगा, रोग प्रतिरोधक क्षमता उतनी मजबूत होगी। चुपचाप हाथ धोइए और कचौड़ी का आनंद लीजिए।”

हलवाई ने दो कचौड़ियां लीं, उन्हें बीच से फोड़ा, और ऊपर से खौलती हुई आलू-चने की तीखी सब्ज़ी डाल दी। ऊपर से कटी हुई हरी मिर्च और धनिया का ऐसा तड़का था कि देखकर ही मैक्स भाई की आँखों से ज्ञान के आँसू निकलने लगे।

मैक्स ने पहला निवाला मुंह में रखा। पहले दो सेकेंड तो उन्हें लगा कि उनके मुंह में कोई ज्वालामुखी फट गया है। मिर्च का ऐसा करारा झटका लगा कि मैक्स भाई की रीढ़ की हड्डी तक कांप गई। वो पानी-पानी चिल्लाने ही वाले थे कि मिश्रा जी ने उनके मुंह में एक गरमा-गरम, रस से भरी, गोल-गोल जलेबी ठूंस दी।

“चुपचाप चबाइए साहेब, यह बनारस का जीवन संतुलन है!” मिश्रा जी ने कहा। जैसे ही जलेबी का रस कचौड़ी की मिर्च से मिला, मैक्स भाई की आँखें बंद हो गईं। उन्होंने थरथराते हाथों से डायरी में लिखा: “बनारसी कचौड़ी-जलेबी महज नाश्ता नहीं है। यह सुख और दुःख का एक दार्शनिक मिश्रण है। कचौड़ी जहाँ जीवन के संघर्षों और तीखेपन को दर्शाती है, वहीं जलेबी उस संघर्ष के बाद मिलने वाले मीठे फल का प्रतीक है।”

कचौड़ी की दुकान पर ही मैक्स भाई की मुलाकात हुई ‘कल्लू गुरु’ से। कल्लू गुरु बनारस के जाने-माने स्थानीय विद्वान थे, जिनकी सुबह बिना चार कचौड़ी और आधा किलो जलेबी के शुरू नहीं होती थी।
गुरु ने पान चबाते हुए पूछा, “का साहेब! क्या खोज रहे हो इस बनारस की धूल में?”

मैक्स ने बड़ी संजीदगी से कहा, “गुरु, मैं यहाँ शाश्वत सत्य और शांति की तलाश में आया हूँ।”

कल्लू गुरु जोर से हंसे, उनकी हंसी से पूरी गली गूंज उठी। उन्होंने मैक्स के कंधे पर हाथ रखा और बोले, “अरे गोरे भाई! शांति चाहिए तो श्मशान चले जाओ, वहाँ एकदम सन्नाटा है। और रही बात सत्य की, तो सत्य सिर्फ तीन ही है—सुबह कचौड़ी, दोपहर को अस्सी पर गंभीर चर्चा, और रात को प्रभु का नाम। इसके अलावा जो खोज रहे हो, वो सब माया है, समझे? यूनिवर्सिटी तुमको डिग्री देगी साहेब, बनारस तुमको ज़िंदादिली देगा।”

शाम को मैक्स भाई अस्सी घाट पर अपनी शोध डायरी लेकर बैठ गए। सामने गंगा जी बह रही थीं। हवा में एक अजीब सा सुकून था। मैक्स को लगा कि हां, यही वो जगह है जहाँ मुझे अपने शोध का सार मिलेगा।
तभी उनके पास एक लड़का आया। उम्र रही होगी कोई बीस साल, हाथ में मालाएं थीं।
“साहेब, इसे ले लो। भाग्य अच्छा रहेगा।”

मैक्स ने कहा, “नहीं धन्यवाद, मैं एक शोधकर्ता हूँ।”

लड़का मुस्कुराया, “अरे शोधकर्ता भाई, तुम अमेरिका से आए हो न? वहाँ तुम लोग तनाव की दवा खाते हो। यहाँ आओ, गंगा जी में डुबकी लगाओ, सारा शोध यहीं पूरा हो जाएगा। यह बताओ, शिवजी का प्रसाद यानी भांग आजमाए कि नहीं?”

भांग—इस शब्द ने मैक्स के खोजी दिमाग की घंटी बजा दी। उन्होंने पढ़ा था कि यह भगवान शिव का प्रसाद है। उन्होंने सोचा, बिना इसके स्वाद के बनारसी चेतना को कैसे समझा जा सकता है? वो सीधे पहुंचे एक सरकारी भांग की दुकान पर। उन्होंने दुकानदार से कहा, “इसे थोड़ा हल्का बनाना।” दुकानदार ने मुस्कुराकर एक विशेष ठंडाई तैयार की। मैक्स भाई उसे दूध का एक स्वादिष्ट पेय समझकर पूरा गटक गए।

ठंडाई पीने के ठीक तीस मिनट बाद, मैक्स भाई को लगा कि वो अस्सी घाट पर नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में तैर रहे हैं। गंगा जी का पानी उन्हें नीले रंग की जगह चमकीला सुनहरा दिखने लगा।

वो घाट की सीढ़ियों पर खड़े हो गए और दोनों हाथ उठाकर चिल्लाने लगे, “मैं ही ब्रह्मांड हूँ! मैं ही शिव हूँ!” आस-पास के मल्लाह और साधु उन्हें देखकर हंसने लगे। एक साधु ने कहा, “लो भाई, गोरे को रंग चढ़ गया।”

मैक्स भाई को अचानक लगा कि वो एक बहुत बड़े दार्शनिक बन गए हैं। वो हर आने-जाने वाले से लिपटकर रोने लगे और कहने लगे, “हम सब एक हैं! तुम भी मैं हूँ, मैं भी तुम हूँ।”

तभी एक आवारा कुत्ता उनके पास आकर अपनी पूंछ हिलाने लगा। मैक्स भाई उसके सामने घुटनों के बल बैठ गए, उसकी आंखों में आंखें डालीं और बोले, “ओह मेरे भगवान, तुम पिछले जन्म में सुकरात थे न?” रात के बारह बजे तक मैक्स भाई अस्सी घाट की सीढ़ियों पर लेटे-लेटे आकाश के तारों को गिन रहे थे और खुद से कह रहे थे, “विज्ञान वाले बेवकूफ हैं, असली अंतरिक्ष शोध तो बनारस की ठंडाई में है।”

अगली सुबह जब मैक्स भाई की आंख खुली, तो उनका सिर ऐसे फट रहा था जैसे अंदर कोई डमरू बजा रहा हो। वो बनारस के एक स्थानीय गेस्ट हाउस के कमरे में थे। उनके सिरहाने नींबू पानी रखा था और कमरे का मालिक, मिश्रा जी, सामने बैठा मुस्कुरा रहा था।

“का गुरु? मिल गया मोक्ष?” मिश्रा जी ने पूछा।

मैक्स ने अपना सिर पकड़ते हुए कहा, “मिश्रा जी, मेरा शोध तो पता नहीं पूरा होगा या नहीं, लेकिन मुझे एक बात समझ आ गई।”

“क्या?”

“बनारस को समझा नहीं जा सकता। बनारस को सिर्फ जिया जा सकता है। यहाँ का हर आदमी एक शोधकर्ता है और हर शोधकर्ता यहाँ आकर खुद को भूल जाता है।”

मिश्रा जी ने हंसते हुए उनकी पीठ थपथपाई, “अरे एकदम सही पकड़े हो साहेब!”

मैक्स भाई ने अपनी डायरी उठाई, उस पर लगी गोबर की सूखी महक को सूंघा, और मुस्कुराते हुए लिखा:
“मेरा शोध पूरा हुआ। मैं यहाँ बनारस का अध्ययन करने आया था, लेकिन बनारस ने मेरा ही अध्ययन कर दिया। बनारस वह जगह है जहाँ तर्क दम तोड़ देता है और जादू शुरू होता है। यहाँ का सांड भी आपको जिंदगी का वो सबक सिखा सकता है जो दुनिया की कोई बड़ी यूनिवर्सिटी नहीं सिखा सकती।”

मैक्स भाई अब पूरी तरह से ‘मैक्स बाबा’ बन चुके थे, जो अमेरिका की सड़कों पर भी शायद अब कचौड़ी और जलेबी का ठेला ढूंढने वाले थे…❤️🌻

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